फसलों में कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल से छिना गौरैया का आशियाना
उजड़ी हरियाली, खड़े हो रहे कंक्रीट के जंगल, मोबाइल टावरों का रेडिएशन बना जानलेवा
लखीमपुर खीरी। कभी घर के आंगन में नन्ही परी की तरह फुदकने वाली गौरैया अब मुश्किल से ही दिखती है। जैसे वह रूठ कर कहीं चली गई हो। रूठे भी क्यों न हमने उनके घर ही नहीं छीने, बल्कि उन्हें दाना पानी देना भी भूल गए। और तो और उनके कुदरती भोजन को बर्बाद करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।
आज से 25-30 साल पहले तक गौरैया घर-परिवार का एक हिस्सा हुआ करती थी। घर के आंगन में फुदकती गौरैया, उनके पीछे नन्हे-नन्हे कदमों से भागते बच्चे। अनाज साफ करती मां के पहलू में दुबक कर नन्ही गौरैयों का दाना चुगना और और फिर फुर्र से उड़कर झरोखों में बैठ जाना। ये नजारे अब शहरों में ही नहीं गांवों में भी नहीं दिखाई देते।
खत्म होती हरियाली, उसकी जगह खड़े होते कंक्रीट के जंगल, खेतों में कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से न केवल उसका कुदरती भोजन छिना, बल्कि उनका आशियाना भी छिन गया। अब मोबाइल टावरों से बढ़ता रेडिएशन उनकी जान लेने पर तुला है। ऐसी स्थिति में कैसे गौरैया हमारे आंगन में फुदकेगी, अनाज साफ करती मां की थाली से अधिकार के साथ कैसे दाना चुराने आएगी।
युवराज दत्त महाविद्यालय में जंतु विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार आगा कहते हैं कि फसलों में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से परिंदों की दुनिया ही उजड़ रही है। गौरैया का भोजन अनाज के दाने और मुलायम कीड़े हैं। गौरैया के चूजे तो केवल कीड़ों के लार्वा खाकर ही जीते हैं। कीटनाशकों से कीड़ों के लार्वा मर जाते हैं। ऐसे में चूजों के लिए तो भोजन ही खत्म हो गया है।
पक्षी प्रेमी और गौरैया संरक्षण के लिए लगातार प्रयास करने वाले केके मिश्रा का कहना है कि गौरैया आमतौर पर पेड़ों पर अपने घोंसले बनाती है। पेड़-पौधे लगातार कम होते जा रहे हैं। यह घर के झरोखों में भी घोंसले बना लेती है। अब जिस शैली में घरों का निर्माण हो रहा है उसमें झरोखे बनते ही नहीं। जब झरोखे नहीं तो गौरैया आखिर घोंसला कहां बनाए।
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक कहते हैं कि मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगें, अनलेडेड पेट्रोल के इस्तेमाल से निकलने वाली जहरीली गैस भी गौरैया और अन्य परिंदों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं।
पिछले कुछ वर्षों में गौरैया संरक्षण के लिए छिटपुट सराहनीय प्रयास भी हो रहे हैं। पांच छह साल पहले घरों और आसपास लकड़ी के कृत्रिम घोंसले स्थापित करने की मुहिम शुरू हुई थी, हालांकि गौरैयों ने इन बनावटी घोंसलों को स्वीकार नहीं किया, लेकिन इस मुहिम से लोग गौरैया संरक्षण के प्रति जागरूक हुए और अपने घर के आंगन, लान और छत की मुंडेरों पर दाना पानी रखना शुरू किया, जिससे गौरैयों की वापसी शुरू हुई है। छोटे शहरों और गांवों में एक बार फिर से गौरैयों की चहचहाहट गूंजना शुरू हुई है। गौरैया को घर परिवार की खुशी का प्रतीक माना जाता है। लोगों का मानना है कि गौरैया लौटेंगी तो घर की खुशियां भी लौटेंगी।
ऐसे मनाएं रूठी नन्ही परी को
- घरों में कुछ ऐसे झरोखे रखें, जहां गौरैया घोंसला बना सके।
- छत पर और आंगन में अनाज के दाने बिखेरें।
- आंगन और छतों पर पौधे लगाएं ताकि पक्षी आकर्षित हों।
- फसलों में कीटनाशकों का प्रयोग न करें।
- घर की मुंडेर पर मिट्टी के बरतन में पानी रखें।
- अनलेडेड पेट्रोल का इस्तेमाल ना करें।