तिकुनिया। सुथना देवी के नाम से प्रसिद्घ मंदिर में स्थापित दुर्गा देवी की मूर्ति स्वयंभू है। लोकमान्यता है कि यहां देवी की सात पिंडियां एक साथ प्रकट हुई थीं। पौराणिक काल के इस मंदिर में लोगों की अगाध श्रद्घा है। बताया जाता है कि खैरीगढ़ स्टेट के तत्कालीन राजा ने जंगल भ्रमण के दौरान 16वीं शताब्दी में इस पौराणिक मूर्ति की खोज की थी। उस समय न तिकुनिया कस्बे का अस्तित्व था न ही आसपास कोई गांव था।
प्राचीन खैरीगढ़ रियासत का हिस्सा रहा यह जंगल कभी गुप्त साम्राज्य का हिस्सा था। खैरीगढ़ के जंगलों में पत्थर की गुप्तकालीन अश्व प्रतिमा और कई अवशेष मिले हैं, जो लखनऊ के राज्य संग्रहालय में सुरक्षित हैं। गुप्त काल से इस क्षेत्र के जुड़ाव के कारण यह भी माना जाता है कि यहां देवी मूर्ति की स्थापना गुप्त काल में हुई होगी। लोगों का विश्वास है कि इस मंदिर में मानी हुई हर मन्नत पूरी होती है।
मंदिर के पुजारी ओंकार गिरि बताते हैं कि सैकड़ों साल पहले यहां घना जंगल था। 16वीं शताब्दी में एक बार खैरीगढ़ स्टेट के तत्कालीन राजा जंब जंगल भ्रमण करने निकले तो इसी स्थान पर उन्हें देवी की दिव्य मूर्ति के दर्शन हुए। उन्होंने विधिवत इस मूर्ति की पूजा अर्चना की और वहीं पर मूर्ति की स्थापना कर दी लेकिन बियाबान जंगल के अंदर मूर्ति होने से यह उपेक्षित ही रही।
इसके बाद 1856 में नेपाल के एक तपस्वी बाबा शंकर गिरी विचरण करते हुए यहां आए और इसी जंगल में एक पाकड़ के पेड़ के नीचे अपना आसन जमा कर रहने लगे। चूकि चोर डाकुओं का यहां बसेरा था, इसलिए कुछ समय बाद ही तपस्वी बाबा फिर नेपाल चले गए। वहां उन्हें आदिशक्ति मां जगदंबा ने स्वप्न में दर्शन देकर उसी स्थान पर जाकर रहने का निर्देश दिया। शंकर गिरी फिर नेपाल से तिकुनिया जंगल में आ गए और यहीं पर पाकड़ के पेड़ के नीचे रहने लगे।
अचानक प्रकट हुई सात पिंडी - बताते हैं कि शंकर गिरी ने जिस पाकड़ पेड़ के नीचे अपना आसन बनाया था, वहीं एक रात सात पिंडिया प्रकट हुईं। यह चमत्कार होने के बाद इसकी चर्चा पूरे इलाके में फैल गई। देवी से मन्नत मानने वालों की भीड़ लगने लगी।
शंकर गिरी ने छोटी सी मठिया बनाकर वहां पूजा-अर्चना शुरू की। धीरे धीरे श्रद्घालुओं ने यहां भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया। मन्नत पूरी होने पर लोग यहां भंडारा और मुंडन और अन्नप्राशन संस्कार कराते हैं। ग्राम पंचायत सुथना में मंदिर होने के कारण यह सुथना देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्घ है।
100 साल पहले हुआ भव्य मंदिर का निर्माण- दुर्गा देवी के मौजूदा मंदिर का निर्माण करीब 100 साल पहले गजराज गिरि के प्रयास से हुआ है। मंदिर का निर्माण खैरीगढ़ स्टेट से दान में मिली चार एकड़ भूमि पर कराया गया है। मंदिर के चारों ओर 12 फीट ऊंची चहारदीवारी है। प्रवेश द्वार से सात मीटर चलने के बाद दाहिनी तरफ तीन ओर से खुला बरामदा है।
बरामदे के अंदर से सात सीढ़ियां चढ़कर मंदिर के अंदर पहुंचा जा सकता है। मंदिर परिसर में नंदी मंदिर काली माता मंदिर, गणेश मंदिर, शिव परिवार, राधाकृष्ण, हनुमानजी और कालभैरव मंदिर हैं। मंदिर की पूर्व दिशा में निर्मल जल से परिपूर्ण एक सरोवर है। मंदिर जमीन की सतह से 12 फीट की उंचाई पर एक चबूतरे पर बना हुआ है।