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जंगली हाथियों का बदल रहा स्वभाव, अब डरने के बजाय डरा रहे

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लखीमपुरखीरी में हाथियों ने उजाड़ी गन्ने की फसल। - फोटो : LAKHIMPUR
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लखीमपुर खीरी। जंगली हाथियों को डराकर भगाने के परंपरागत उपाय अब कारगर नहीं हो रहे हैं। उल्टे इससे चिढ़ कर हाथी उग्र और आक्रामक हो रहे हैं। अब यह जंगली हाथी इंसानों से डरने के बजाय उन्हें डरा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते परिवेश और परिस्थितियों की वजह से जंगली हाथियों के स्वभाव में यह बदलाव आ रहा है।
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नेपाल के शुक्लाफांटा वन्यजीव विहार से निकलकर आए जंगली हाथी पिछले दो माह से दुधवा टाइगर रिजर्व और पीलीभीत टाइगर रिजर्व में भ्रमण कर रहे हैं। यहां प्रवास के दौरान वह रोज जंगल से निकलकर खेतों में उत्पात मचा रहे हैं। किसानों की धान, गन्ने की फसलों को रौंद कर बर्बाद कर रहे हैं। किसान और वन कर्मी इन हाथियों को खदेड़ने के लिए आग जला रहे हैं। गोले पटाखे दाग रहे हैं। शोर मचाने के साथ मिर्च का धुआं भी कर रहे हैं लेकिन इसका कोई असर उन पर नहीं पड़ रहा है। उल्टे ऐसा करने पर जंगली हाथियों का उत्पात और बढ़ रहा है। कई बार तो यह हाथी ग्रामीणों और वनकर्मियों को भी दौड़ा लेते हैं। मंगलवार को जंगली हाथियों ने निगरानी कर रही वनकर्मियों की टीम को ही दौड़ा लिया। किसी तरह भागकर वनकर्मियों ने अपनी जान बचाई। इससे पहले भी हाथियों का यह झुंड निगरानी टीमों को दौड़ा चुका है। इसके चलते इन हाथियों की निगरानी में भी बड़ी सावधानी बरतनी पड़ रही है।
इसलिए बदल रहा जंगली हाथियों का स्वभाव
दुधवा टाइगर रिजर्व के पशु चिकित्सक डॉ. दया शंकर का कहना है कि नेपाल में अधिकांश जंगल कट चुका है। वहां हाथियों के प्राकृतवास और भोजन का संकट है। आम तौर पर हाथी अपना 90 फीसदी भोजन जंगल से प्राप्त करते हैं। 10 फीसदी भोजन बाहर से लेते हैं। नेपाल में जंगल कट जाने से वहां हाथियों को खेतों में खड़ी फसलों से अपना भोजन लेना पड़ रहा है। नेपाल के किसान हाथियों से फसल बचाने के लिए गोले पटाखे दागने, मिर्च का धुआं करने और शोर मचाने जैसे परंपरागत उपाय अपना रहे हैं। अब यह हाथी इन सबके आदी हो चुके हैं। अब इन उपायों से उन्हें डर नहीं लगता। उल्टे भोजन में व्यवधान पड़ने से इन्हें चिढ़ होती है और यह आक्रामक हो जाते हैं।
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दुधवा का प्रवास पसंद है नेपाली हाथियों को
दुधवा टाइगर रिजर्व में घने जंगल के साथ-साथ यहां वह सारी वनस्पतियां और घास पाई जाती हैं जो हाथियों का पसंदीदा भोजन है। इससे हाथियों को यहां पर्याप्त भोजन मिलता है। रही सही कसर जंगल से सटे खेतों में बोई जाने वाली धान और गन्ने की फसलें पूरी कर देती हैं। गन्ना हाथियों को काफी पसंद है। गन्ने के साथ मुलायम चारे के रूप में धान की फसल भी उपलब्ध रहती है। जंगल के अंदर नरकुल के मैदान इन्हें भोजन के साथ प्राकृतवास भी मुहैया कराते हैं। पानी के लिए नदियां नाले और तालाब हैं। इस तरह इन हाथियों को दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगल में भोजन, पानी और प्राकृतवास सब कुछ मिलता है। यही कारण है नेपाली हाथियों को दुधवा ज्यादा रास आ रहा है।
दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगल जंगली हाथियों के लिए बेहद अनुकूल प्राकृतवास, पर्याप्त भोजन, पानी और सुरक्षा सब कुछ उपलब्ध कराते हैं। यही कारण है कि नेपाल से आए हाथी यहां आने के बाद जल्दी वापस जाने का नाम नहीं लेते।
इस समय भी 16 नेपाली हाथियों का झुंड दुधवा टाइगर रिजर्व में प्रवास कर रहा है। यह देखा गया है कि अब इन्हें खदेड़ने के लिए अपनाए जा रहे परंपरागत उपाय हाथियों पर कारगर नहीं हो रहे हैं।
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- डॉ. अनिल पटेल, उपनिदेशक दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन
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