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शहीद अमित त्रिपाठी के पुत्र हैं कुशाग्र

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बुलंद इरादों से कुशाग्र ने पूरा किया सपना
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पिता की शहादत के बाद कुशाग्र भी कर रहे देश की सुरक्षा
नित्यानंद पांडेय
गुरवलिया बाजार। शहीद मेजर अमिय त्रिपाठी के पदचिह्नों पर चलते हुए उनके बेटे कुशाग्र भी देश की सुरक्षा में डटेंगे। उन्होंने साल पहले सीडीएस (संयुक्त रक्षा सेवा) में पहला रैंक प्राप्त किया। उनका चयन लेफ्टिनेंट के पद पर हुआ है। उन्हें जनरल विपिन रावत ने शाबाशी दी है। वह पुणे में प्रशिक्षण ले रहे हैं। वर्ष 2023 में उनका प्रशिक्षण पूरा होगा। कुशाग्र ने अपने पिता की गौरव कथा सुनकर देश की सेवा करने का निर्णय लिया है।
तमकुही क्षेत्र के भेलया गांव निवासी रामसकल त्रिपाठी के छोटे बेटे शहीद मेजर अमिय त्रिपाठी 25 मई 2004 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकवादियों से लोहा लेते वक्त शहीद हो गए थे। इससे पहले उन्होंने मुठभेड़ में चार आतंकियों को मार गिराया था। पिता के साहस से जुड़ीं कहानियों को सुनकर बड़े हुए कुशाग्र का भी सपना था कि देश की सेवा के लिए सेना में जाएं। माता रंजना त्रिपाठी ने ढाई साल के इकलौते बेटे को सेना में भेजने का फैसला लिया था। मां की उम्मीदों और पिता के अधूरे सपने को पूरा करने के लिए बेटे कुशाग्र उर्फ आयुष त्रिपाठी ने मुसीबतों को अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने दिया और न ही हालात से समझौता किया। पूरी मेहनत और लगन से सेंट फ्रांसिस स्कूल लखनऊ से हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। इसके बाद दिल्ली से स्नातक किया। उसी दौरान कुशाग्र तैयारी में जुटे रहे। उनकी मेहनत और माता-पिता का आशीर्वाद रंग लाया। सीडीएस (संयुक्त रक्षा सेवा) की ओर से आयोजित परीक्षा में पहला स्थान प्राप्त किए। उनका चयन लेफ्टिनेंट के पद पर हो गया। इससे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई है। मां का व्रत पूरा हुआ। कुशाग्र त्रिपाठी कहते हैं कि अगर सच्ची लगन और श्रद्धा हो, हम अपने लक्ष्य के प्रति सजग हों तो कुछ भी मुश्किल नहीं। अफसर बनकर पिता को श्रद्धांजलि अर्पित की है और पिता की तरह ही वह भी मातृभूमि के चरणों में सर्वस्व अर्पित करने में कभी पीछे नहीं हटेंगे। संवाद
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बड़े पिता ने की तारीफ
शहीद अमिय त्रिपाठी के बड़े भाई पूर्व आरटीओ अजय त्रिपाठी बताते हैं कि दो साल पहले सीडीएस की परीक्षा उत्तीर्ण कर कुशाग्र पिता के सपने को पूरा कर रहा है। शुरू से ही कुशाग्र पढ़ाई में अव्वल रहा। इतनी कम उम्र में इसकी सफलता ने युवाओं को प्रेरित किया।
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बेटे को सफल बनाने के बाद मां ने भी छोड़ा साथ
17 वर्षों तक अपने इकलौते बेटे के लिए समर्पित रही मां रंजना का ख्वाब पूरा तो हो गया, लेकिन वह जिंदगी के मध्य पड़ाव में बीमारी से जंग हार गईं। पति की शहादत के बाद कुशाग्र की परवरिश के साथ-साथ सामने कई अन्य चुनौतियां भी थीं। रंजना ने खुद को बिखरने से रोका और साहस बटोरकर बेटे पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने ठान लिया था कि बेटे को भी देशसेवा में अर्पित करेंगी। ख्वाब और सपने पूरे तो हुए, लेकिन खुशी के क्षणों को हिस्सा न बना सकीं।
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