अपने वास्तविक अस्तित्व को तलाश रही है पौराणिक नदी बांसी
कुशीनगर। पौराणिक और धार्मिक महत्व को समेटी भगवान राम से जुड़ी बांसी नदी की दशा दिन प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है। एक के बाद एक नदियों और प्राकृतिक जलस्रोतों को संजोने और उनका सौंदर्यीकरण पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन जनपद की प्रमुख नदियों में शुमार बांसी नदी के प्रति कोई गंभीरता नहीं दिखती। इसके लिए सफाई या सौंदर्यीकरण की योजना तक नहीं है जिससे इसके अस्तित्व को बचाया जा सके।
दूसरी ओर, नदी में मछली पकड़ने के लिए लोगों ने जगह-जगह पानी का बहाव अवरुद्ध कर दिया है। झाड़ियां, जलकुंभी और अतिक्रमण के चलते यह नदी अपना वास्तविक आकार और वजूद खोती जा रही है। जबकि भगवान राम से जुड़ी आस्था की वजह से कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर हर साल नदी के तट पर बांसी में मेला लगता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के लाखों श्रद्धालु बांसी और रामघाट पहुंचकर डुबकी लगाते हैं। इसके अलावा अंत्येष्टि के लिए भी लोग दूर-दूर से आते हैं।
कटाई भरपुरवा में नारायणी (गंडक) नदी से निकली बांसी नदी पडरौना क्षेत्र के बांसी स्थान होते हुए सेवरही के शिवाघाट से आगे पिपराघाट में नारायणी में जाकर मिल जाती है। यह नदी बहुत से गांवों को अपने जल से प्रभावित करती रहती है। इस नदी के महत्व के बारे में मान्यता है कि ‘सौ काशी न एक बांसी’ अर्थात सौ बार काशी के गंगा नदी में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, उतना एक बार बांसी नदी में स्नान करने से मिलता है। त्रेता युगीन पौराणिक महत्व की यह नदी संबंधित क्षेत्र के लोगों के लिए काफी महत्वपूर्ण रही है। ऐसी मान्यता है कि मिथिला से अयोध्या जाते समय भगवान श्रीराम ने बरात के साथ बांसी नदी के तट पर रात विश्राम किया था। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर स्नान करने पर मोक्ष प्राप्ति की मान्यता के चलते इस नदी में लाखों लोग डुबकी लगाते हैं। इसके अलावा नदी के बांसी और रामघाट अंत्येष्टि के लिए वर्ष भर लोगों का आना लगा रहता है।
बांसी नदी की उचित देखभाल और संरक्षण की दिशा में कोई कारगर कदम न उठाए जाने के कारण स्थिति दयनीय होती जा रही है। लोगों ने मछली पकड़ने के लिए नदी के बहाव को जगह-जगह अवरुद्घ कर दिया है। नदी में झाड़ियां, जलकुंभी आदि इतनी भरी हुई है कि पानी का बहाव नहीं हो पा रहा है। इससे नदी का जल साफ नहीं रह गया है। इसी वजह से लोग अब इस नदी में स्नान करने में संकोच करते हैं।
क्षेत्र के लोग बोले-
- अरनहवा गांव के निवासी जितेंद्र यादव कहते हैं कि यह पौराणिक महत्व की नदी है। दशकों से यहां मेला देखते आ रहे हैं। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर दूर-दूर से श्रद्धालु आते रहे हैं। स्नान-दान कर पुण्य प्राप्त करते हैं। लेकिन, इस नदी की उचित देखभाल नहीं हो पा रही है।
- माघी कोठिलवा के पवन कुशवाहा कहते हैं कि बांसी नदी जनपद के लोगों के लिए पूजनीय रही है। इसकी सफाई न होने से पानी स्वच्छ नहीं रह गया है।
- हनुमान इंटरमीडिएट कॉलेज पडरौना के प्रधानाचार्य शैलेंद्र दत्त शुक्ल बताते हैं कि बांसी नदी से लोगों की आस्था जुड़ी है, लेकिन नदी की मौजूदा हालत चिंताजनक है। इसका पानी पहले की तरह स्वच्छ नहीं रह गया है। इसके वृहद स्तर पर प्रयास की जरूरत है।
- खिरकिया निवासी नरेंद्र तिवारी ने कहा कि बांसी नदी लोगों की आस्था से जुड़ी हुई है। इसके जीर्णोद्धार के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए। बांसी नदी की कई जगह सफाई नहीं होने से अपना वास्तविक आकार खोती जा रही है।
सांसद बोले
बांसी नदी भगवान राम से जुड़ी प्रमुख नदी है। इसकी सफाई के लिए दो साल से प्रयास किया जा रहा है। जल शक्ति मंत्री भारत सरकार को पत्रक देकर इस नदी की मशीन से सफाई कराने का अनुुरोध किया गया है। यह कार्य पूरा कराया जाएगा ताकि इसका जल अविलरल रूप से प्रवाहित होता रहे। जिन लोगों ने नदी के बहाव को अवरुद्ध किया है, उसे भी हटवाया जाएगा। इसके अतिरिक्त नदी के बांसी घाट पर पार्क, श्रद्धालुओं के लिए रैन बसेरा, अंत्येष्टि स्थल, नदी के घाट का जीर्णोद्धार कराया गया है। इसके अलावा रात में प्रकाश के लिए हाईमास्ट लाइट लगवाई गई है।
-विजय कुमार दुबे, सांसद