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रामराज की कुंजी है 178 साल पुरानी माधोपुर की रामलीला

Wed, 17 Oct 2018 10:28 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला कुश्ाीनगर
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मठिया माधोपुर की रामलीला में अभिनय करते गांव के कलाकार। - फोटो : amarujala
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तुर्कपट्टी। देश में एक तरफ जहां सामाजिक सौहार्द को लेकर बहस होती है, वहीं 178 वर्ष पुरानी तुर्कपट्टी क्षेत्र के मठिया माधोपुर की रामलीला क्षेत्र के लिए ही नहीं देश के लिए एक नजीर है। यहां हिंदू मुस्लिम दोनों वर्ग के लोग रामलीला मंच पर अपने किरदार निभाकर सामाजिक समरसता का संदेश दे रहे हैं।
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1839 में गांव के अयोध्या मिश्र सावन झूला देखने अयोध्या गए। वहां तुलसीकृत रामलीलाओं का मंचन देख इतने प्रभावित हुए कि 1840 में अपने तथा पड़ोसी गांव शिराजपुर, बतरडेरा, पिपरा, बरवा कला आदि गांव के सभी जाति धर्म के लोगों के साथ मिलकर रामलीला का मंचन शुरु किया। तब यह रामलीला मैथिली और भोजपुरी भाषा में होती थी।। पड़ोसी गांव बतरडेरा के 102 वर्षीय बुजुर्ग रमाकांत पांडेय बताते हैं कि आजादी के बाद रामलीला मंचन के लिए अलग-अलग राज्य बनाए जाते थे।
लंका अयोध्या नगरी, जनकपुर, किसकिन्धा आदि। तब मुरलीधर मियां और रामधार हरिजन रामायण पाठ करते थे। 1908 में मुस्लिम समुदाय के ठगई राय ने ताड़का के रोल के दौरान पहली बार मार डालूंगी,,, काट डालूंगी,,, बोलकर रामलीला को हिंदी भाषा से जोड़ा। आज भी गांव की परंपरा बदस्तूर जारी है। ठगई राय के निधन के बाद उनके बेटे मैनुद्दीन अंसारी अब सुमंत और कुंभकर्ण का किरदार निभाते हैं। सोबराती मियां राम, रावण, सूर्पणनखा और जटायु आदि किरदारों के मेकअप करते हैं। उनके बेटे ईश मुहम्मद और बब्बन अली भी प्रमुख भूमिका निभाते हैं। गांव के इबारत मंच सज्जा और आरती गायन संभालते हैं। गांव की रामलीला एक पखवारा चलती है, जो आज भी जारी है। पहले यहां कई जनपदों के सोना चांदी, बर्तन, मिष्ठान और कपड़ा आदि के व्यापारी आते थे। अब मेला काफी छोटा हो गया है। डॉ इंद्रजीत मिश्र बताते हैं कि नए प्रयोग के चलते यहां शरद पूर्णिमा के दिन रावण का पुतला दहन कर दशहरा मनाया जाता है।
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