कस्बे में 292 साल पहले यहां की रामलीला का मंचन शुरू हुआ था। पहले यहां राम लीला जगह बदल-बदल कर सिर्फ तीन दिन होती थी। इसके बाद 1901 से राम लीला का मंचन निर्धारित स्थल पर तेरह दिनों तक होने लगा। तेरह दिनों तक चलने वाली यहां की रामलीला में लोग आस्था में डूब कर भगवान के भौतिक स्वरूप का दर्शन करते हैं।
करारी की रामलीला का इतिहास काफी पुराना है। 1729 ई.के आसपास जब मुगलों से बुंदेलों का संघर्ष हुआ तो बुंदेले एकजुटता का पैगाम देने दोआबा की धरती पर आए थे। वह धार्मिक नाटकों के माध्यम से पहले लोगों की भीड़ इकट्ठा करते थे। फिर मौजूद लोगों से एकजुट होने का आह्वान करते थे। यहां भ्रमण के दौरान बुंदेला सरदार छत्रसाल के बेटे हरदे नारायण करारी भी आए थे। संगठित होने का संदेश देने के लिए उन्होंने ही यहां रामलीला शुरू कराई।
उनके जाने के बाद स्थानीय लोगों के सहयोग से यहां लगातार रामलीला का मंचन होता रहा। जगह निर्धारित न होने से कई बार जगह बदली गई। उस समय रामलीला में काफी दिक्कतें आया करती थीं। सन 1901 रामाधीन भट्ट ने रामलीला के लिए अपनी जमीन को दान में दिया। कस्बे के धनाढ्य रामसुख केसरवानी, छोटेलाल रस्तोगी, राम भरोस जायसवाल, पुद्दु बाबा आदि के सहयोग से रामलीला का मंचन तेरह दिनों तक किया जाने लगा। सन 2001 में रामलीला का भव्य शताब्दी समारोह मनाया गया था।
बुंदेलखंड के होते हैं अधिकतर पात्र
यहां की रामलीला में अधिकतर पात्र बुंदेलखंड से बुलाए जाते हैं। तेरह दिनों तक यहां के लोग श्रद्धा के साथ भगवान श्री राम, लक्ष्मण, सीता व श्री हनुमानजी के भौतिक स्वरूप का दर्शन करते हैं। इस दौरान कस्बे में उत्सव जैसा रहता है।
समय के साथ बहुत कुछ बदला
करारी। पहले यहां की रामलीला मशाल जलाकर होती थी। इसके बाद लालटेन व गैस जलाकर होने लगी। समय के बदलाव के साथ अब आधुनिक विद्दुत लाइट की चकाचौंध में हो रही है।
इनका कहना है
करारी की रामलीला ऐतिहासिक है। 1729 में बुंदेलों ने यहां की रामलीला शुरू कराई थी। समय के साथ रामलीला में काफी बदलाव किया गया है। । तेरह दिनों तक चलने वाली यहां की रामलीला में लोग आस्था में डूब कर भगवान के भौतिक स्वरूप का दर्शन करते हैं। - संजय जायसवाल-अध्यक्ष, श्री राम लीला कमेटी करारी।