शहरकाजी मुफ्ती मंजूर अहमद मजाहिरी ने बीमारी और वृद्धावस्था की वजह से सक्रियता कम होने के मद्देनजर गुरुवार को मर्चेंट चैंबर हॉल में अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
देवबंदी विचारधारा के प्रमुख आलिम-ए-दीन मौलाना मतीनुल हक ओसामा अगले शहरकाजी होंगे। इस पर मतभेद हो गए हैं। क्योंकि शहरकाजी पद के एक और प्रबल दावेदार मौलाना अब्दुल कुद्दूस हादी सऊदी अरब उमरा करने गए हुए हैं और दो फरवरी को लौटेंगे, तब कोई फैसला लेंगे।
मौलाना मतीनुल हक ओसामा फिलहाल कार्यवाहक शहरकाजी की भूमिका निभाएंगे। मौलाना ओसामा का नायब शहरकाजी हाफिज मामूर अहमद को बनाया गया है, जो मुफ्ती मंजूर मजाहिरी के पुत्र हैं। पगड़ी बांधकर दोनों को जिम्मेदारी सौंपी गई।
मुख्य अतिथि लखनऊ ईदगाह के इमाम और आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगीमहली और विशिष्ट अतिथि एडीएम सिटी आशुतोष अग्निहोत्री रहे। इसके अलावा शहर के प्रमुख उलेमा, मुस्लिम बुद्धिजीवी, कारोबारी और राजनीतिज्ञ भी गवाह बने।
कार्यक्रम में बड़ी ईदगाह के इमाम कारी मोहम्मद इलाही, रिटायर्ड जज एएच हाशमी, मुफ्ती अब्दुर्रशीद, मुफ्ती इनामउल्ला कासमी, ताज खुसरो, मौलाना सईद कासमी, शाहिद नफीस, रिजवानउल्ला, हाजी फरहत हुसैन, सरताज अनवर, रिजवान हामिद, मोईन लारी, हाजी मुन्ना, जुबैर अहमद फारूकी, डॉ. इशरत सिद्दीकी, अख्तर हुसैन अख्तर मौजूद रहे।
विपक्षी गुट सक्रिय
शहरकाजी पद के दावेदार मौलाना अब्दुल कुद्दूस हादी का गुट भी सक्रिय है। वह स्वयं को कार्यवाहक शहरकाजी कहते हैं। इस समय वह सऊदी अरब उमरा करने गए हैं। इसके पहले ‘अमर उजाला’ से हुई बातचीत में वह भी वह कह चुके हैं कि उलेमा का शहरकाजी बनना उसकी अवाम के प्रति सेवा और जज्बे और काम पर निर्भर करती है।
गुरुवार को भी सऊदी अरब से फोन पर उन्होंने कहा कि कोई शहरकाजी किसी दूसरे को शहरकाजी नहीं बना सकता है। मौजूदा शहरकाजी को शासन ने बनाया था तो अगला शहरकाजी भी इसी प्रक्रिया के तहत बनेगा। कहा कि वह दो फरवरी को लौटकर कोई फैसला लेंगे।
हालांकि शहरकाजी मुफ्ती मंजूर मजाहिरी ने यह साफ कर दिया है कि अगर पिछले सालों में उन्होंने बीमारी के चलते किसी को कोई पद के लिए घोषणाएं की हैं, तो वे सब निरस्त की जाती हैं। इसलिए पिछला कोई भी सबूत अब मान्य नहीं होगा।
गवर्नर ने बनाया था शहरकाजी
मुफ्ती मंजूर अहमद मजाहिरी को 1979 में राज्यपाल ने काजी-ए-शहर की उपाधि दी थी। पूर्व शहरकाजी अहमद हुसैन के इंतकाल के बाद उन्हें शहरकाजी बनाया गया।
मुफ्ती मंजूर 1953 में कानपुर आए और पटकापुर स्थित शहर के सबसे बड़े मदरसा जामे उलूम के सदर मुदर्रिस रहे। काजी-ए-शहर का पद शरीयह एप्लीकेशन एक्ट-1937 के तहत है। आजादी के बाद भी मुसलमानों को निकाह, खुला, विरासत और हिबाह आदि मसलों को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तहत सुलझाने का कानूनी अधिकार हासिल है।
यह हैं मौलाना ओसामा
मौलाना मतीनुल हक ओसामा जमीअत उलेमा-ए-हिंद के प्रदेश उपाध्यक्ष और जिला महामंत्री हैं। जाजमऊ के मदरसा जामिया महमूदिया अशरफुल उलूम के संचालक के अलावा जमीअत के राष्ट्रीय महामंत्री मौलाना महमूद मदनी के बेहद करीबी हैं। मुसलमानों के दीनी और सामाजिक मामलों को हल करने के अलावा समय-समय पर रहनुमाई करते आए हैं।
इसके पहले वह नायब शहरकाजी की भूमिका निभा चुके हैं। हाफिज मामूर अहमद अपने पिता शहरकाजी मुफ्ती मंजूर अहमद मजाहिरी का कामकाज देखते रहे हैं। मेस्टन रोड स्थित पीली मस्जिद के इमाम और मदरसा शिक्षक भी हैं।
व्यक्तिगत मामलों पर फतवे देने से बचें मुफ्ती : फिरंगीमहली
कानपुर(ब्यूरो)। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य और लखनऊ ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगीमहली ने मुफ्तियों को व्यक्तिगत मामलों पर फतवे देने से बचने की सलाह दी है।
उन्होंने कहा कि सामूहिक मामले पर फतवे दें। किसी एक या दो लोगों के मामलों पर मांगे गए फतवों को देने से बचें। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इमराना के मामले पर दिया गया फतवा बहस का मुद्दा बना था।
गुरुवार को मर्चेंट चैंबर हॉल में उलेमा के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि 2005 में सुप्रीमकोर्ट में दारुल कजा (शरई अदालत) के खिलाफ दाखिल हुई याचिका में कोर्ट ने उसका समर्थन किया। कोर्ट ने कहा था कि दारुल कजा के माध्यम से कई बड़े मसले कम खर्च में आसानी से सुलझ जाते हैं।
उन्होंने प्रदेश सरकार के कामकाज पर संतुष्टि जताते हुए कहा कि मुसलमानों को अगर आरक्षण देने में कानूनी पेच है तो सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों की 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी सुनिश्चित हो। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में नेताओं की बढ़ती हिस्सेदारी पर कहा कि बोर्ड एक सामूहिक जमात है। सिर्फ उलेमा ही नहीं सभी मुस्लिम बुद्धिजीवियों और जानकारों को उसमें रहने का अधिकार है।