फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कानपुर: पेटेंट तकनीक से हैलट में रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा के रोगी को दी गई दुनिया की पहली स्टेम सेल थेरेपी

Tue, 23 Nov 2021 08:22 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

विशेष पेटेंट डिवाइस से रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा मर्ज का इलाज करने वाला यह दुनिया का पहला केस हो गया है। यह विशेष डिवाइस सुप्रा कोराइडिल नीडल नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. खान के नाम पेटेंट है। हैलट में शुक्लागंज के रहने वाले 30 साल के नेत्ररोगी को स्टेम सेल थेरेपी दी गई।
विज्ञापन
कानपुर हैलट - फोटो : amar ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

दुनिया में पहली बार विशेष पेटेंट डिवाइस से रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा मर्ज के नेत्ररोगी को स्टेम सेल थेरेपी दी गई है। मंगलवार को जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. परवेज खान ने स्टेम सेल थेरेपी के विशेषज्ञ डॉ. बीएस राजपूत के साथ थेरेपी दी। रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा के रोगी को स्टेम सेल थेरेपी दिए जाने का यह देश का पहला केस है।
विज्ञापन


विशेष तकनीक का इस्तेमाल होने के कारण यह दुनिया का पहला केस हो गया है। यह विशेष डिवाइस सुप्रा कोराइडिल नीडल नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. खान के नाम पेटेंट है। हैलट में शुक्लागंज के रहने वाले 30 साल के नेत्ररोगी को स्टेम सेल थेरेपी दी गई। वह पांच साल की उम्र से इस बीमारी की गिरफ्त में था।

इसके बाद उसकी आंख की रोशनी चली गई थी। जांचों के बाद उसे स्टेम सेल थेरेपी के लिए चुना गया। मंगलवार को विभागाध्यक्ष डॉ. परवेज खान और मुंबई के स्टेम सेल थेरेपी विशेषज्ञ व जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. बीएस राजपूत ने रोगी को थेरेपी दी।
विज्ञापन
विज्ञापन

उसकी आंख में रेटिना की ऊपरी सतह सुप्रा कोराइडल स्पेस में स्टेम सेल दी गईं। उम्मीद की जा रही है कि इससे रिकवरी तेज होगी। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने बताया कि रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा में स्टेम सेल थेरेपी का देश में पहली बार इस्तेमाल किया गया है। लेकिन, डॉ. खान की पेटेंट डिवाइस से यह दुनिया का पहला मामला है। यह तकनीक डॉ. खान के नाम पेटेंट है।

क्या है विशेष पेटेंट डिवाइस
आंख की रेटिना की सतह के ऊपर आठ सौ माइक्रॉन की झिल्ली होती है। अभी तक इसे भेदकर दवा डालने की कोई डिवाइस नहीं थी। नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. परवेज ने विशेष प्रकार की नीडल खोजी। इसकी मदद से सुप्रा कोराइडल लेयर में दवा पहुंचाई जा सकती है। डॉ. खान ने बताया कि झिल्ली इतनी बारीक है कि जरा सा अधिक भेदने पर दवा उस पार आंख के हिस्से में चली जाएगी। इस झिल्ली में दवा डालने से वह रेटिना तक पहुंच जाती है। इसके साइड इफेक्ट्स भी नहीं होते। उनके नाम यह तकनीक पेटेंट हो गई।

क्या है रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा?
इस बीमारी में रेटिना की कोशिकाएं अपने आप मरने लगती हैं। इससे रोगी को पहले रात में और फिर दिन में दिखना बंद हो जाता है। इसके बाद आंख की रोशनी चली जाती है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें