हैलट के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आरके मौर्या का कहना है कि अस्पताल में जो गंभीर रोगी आते हैं, वे पहले कहीं इलाज कराकर हालत बिगाड़ चुके होते हैं। बहुत से इतनी नाजुक हालत में आते हैं कि इलाज के दौरान मौत हो जाती है।
सस्ते इलाज के चक्कर में लोग अपनी जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। हैलट में भर्ती होने वाले 70 प्रतिशत ऐसे मरीज हैं, जो नीम-हकीम से इलाज कराकर अपने रोग की जटिलताएं बढ़ा लेते हैं और स्थितियां गंभीर हो जाती हैं। दरअसल, ये झोलाछाप मरीज की जांच नहीं कराते और तुक्के से इलाज करने लगते हैं।
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अनापशनाप और गलत दवाओं से रोगियों के गुर्दे और लिवर खराब हो जाते हैं। कई बार तो रोगी सेप्टीसीमिया की हालत में चले जाते हैं और उनका सांस तंत्र फेल हो जाता है। हैलट आने वाले रोगियों की डायग्नोसिस से यह स्थिति सामने आई है। हैलट के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आरके मौर्या का कहना है कि अस्पताल में जो गंभीर रोगी आते हैं, वे पहले कहीं इलाज कराकर हालत बिगाड़ चुके होते हैं। बहुत से इतनी नाजुक हालत में आते हैं कि इलाज के दौरान मौत हो जाती है। ब्योरा खंगालने पर पता चलता है कि रोगी ऐसी दवाएं खा रहे थे, जिन्हें उनकी जरूरत ही नहीं थी। जांचें न कराने से ऐसा होता है।
केवल 10 फीसदी रोगी आते हैं सीधे हैलट
रोगियों के अध्ययन से पता चला है कि 20 फीसदी रोगी ऐसे होते हैं, जो पहले किसी नर्सिंगहोम में इलाज कराते हैं। हालत बिगड़ने और पैसा खत्म होने पर वे हैलट आते हैं। इनमें ज्यादातर नर्सिंगहोम अपंजीकृत होते हैं। सिर्फ 10 फीसदी रोगी ही ऐसे होते हैं जो बीमार पड़ने पर सीधे हैलट आते हैं। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला का कहना है कि अगर रोगी झोलाछापों के चक्कर में न पड़ें और सीधे अस्पताल आएं तो उन्हें पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।
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हैलट ओपीडी में महीने में औसतन आने वाले मरीज : 36000
हर महीने भर्ती होने वाले मरीज : 3000
झोलाछाप से इलाज कराकर आने वाले मरीज : 2100
नर्सिंगहोमों से रेफर होकर आने वाले मरीज : 600
सीधे हैलट आने वाले रोगी : 300
झोलाछाप के इलाज से होने वाली परेशानियां
- छह सौ रोगियों के गुर्दों में आती दिक्कत
- चार सौ के लिवर में होती है परेशानी
- सांस तंत्र प्रभावित होता छह सौ रोगियों का
- तीन सौ रोगियों को न्यूरो की दिक्कत
- दो सौ रोगियों की अस्थि और दूसरी दिक्कतें होती हैं।
केस : एक
नौबस्ता के राघवेंद्र (45) को तेज बुखार आया। उन्होंने क्षेत्र के एक झोलाछाप को दिखाया। आठ दिन दवा खाने के बाद उसके पेशाब में जलन होने लगी। इसके बाद हैलट ओपीडी में दिखाया। यहां पैथोलॉजी में जांच हुई तो सीरम क्रेटनिन दो आया है। इस पर गुर्दा रोग की दवा शुरू हो गई। उसका कहना है कि दवा खाने के बाद से दिक्कत हुई। उसके पहले कोई परेशानी नहीं थी।
केस-दो
चौडगरा (फतेहपुर) के रहने वाले ब्रजेश (45) को वायरल संक्रमण हुआ था। क्षेत्र के झोलाछाप से दवा ली, उसके बाद उसे चक्कर आने लगे और न्यूरो की समस्या हो गई। इसके साथ ही उसके लिवर फंक्शन टेस्ट में गड़बड़ी आई है। हैलट मेडिसिन ओपीडी में दिखाया तो पता चला उसे स्टीरॉयड अधिक मात्रा में दी गई है। ब्रजेश का मनोरोग, न्यूरो साइंसेज में ओपीडी स्तर पर इलाज चल रहा है।
सस्ते और सुलभ होते हैं तो चले जाते हैं झोलाछाप के पास
रोगियों के परिजनों का कहना है कि रात-बिरात तबीयत खराब होने पर झोलाछाप आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। अस्पताल जाने पर डॉक्टर नहीं मिलते और तमाम दिक्कतें होती हैं। जुकाम-बुखार होने पर उनसे दवा ले लेते हैं। क्या पता कि वे गलत दवा दे रहे हैं? इसके अलावा 50-100 रुपये में सारी दवा दे देते हैं।
सरकारी अस्पतालों में 30 फीसदी ही सुविधाएं
झोलाछाप बहुत बड़ी समस्या हैं। सरकारी अस्पतालों में 30 फीसदी ही सुविधाएं हैं। ये अपर्याप्त हैं। गरीब मजबूरी में झोलाछापों के यहां जाता है। झोलाछाप को पता नहीं होता कि कौन सी दवा देनी है और कौन सी नहीं? बहुत सी बीमारियां अपने आप ठीक हो जाती हैं तो लोग समझते हैं कि इलाज से ठीक हो गए। निजी अस्पतालों के खर्चे बहुत हैं। अब तो झोलाछापों ने नर्सिंगहोम खोल लिए हैं। क्वालिटी चिकित्सा सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता नहीं है। इससे रोगी को नुकसान बहुत हो रहा।- डॉ. पंकज गुलाटी, अध्यक्ष इंडियन मेडिकल एसोसिएशन
लोग जानकारी न होने के कारण झोलाछापों के चंगुल में फंस जाते हैं। झोलाछाप बिना सोचे-समझे दवा दे देते हैं। स्टेरॉयड जैसी दवा से बहुत नुकसान होता है। लोग जागरूक हों और झोलाछापों से बचें। सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था है वहां जाकर इलाज कराएं।- डॉ. आलोक रंजन, सीएमओ
एडवाइजरी
- रोगी डिग्री वाले डॉक्टर से इलाज कराएं।
- सीएचसी-पीएचसी पर जाकर दिखाएं।
- फायदा होने पर जिला अस्पताल जाएं, वहां से संतुष्ट न होने पर मेडिकल हॉस्पिटल आएं।
- मेडिकल स्टोर वाले से पूछकर दवा न लें।
- अपने मन से एंटीबायोटिक दवाएं न लें।
- बेवजह दवा खाने से हालत अति गंभीर हो सकती है। (प्रो. संजय काला, मेडिकल कॉलेज प्राचार्य)