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इत्रनगरी: 11 के सिर बंधा जीत का सेहरा, अब तक तीन ही दोहरा सके कामयाबी, इस सीट से अखिलेश लगा चुके हैं हैट्रिक

Tue, 09 Apr 2024 05:43 PM IST
शिखा पांडेय तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज

सार

इत्रनगरी में अब तक 11 के सिर जीत का सेहरा बंधा है। जबकि तीन नेता ही कामयाबी दोहरा सके हैं। कन्नौज संसदीय सीट से अखिलेश लगातार तीन बार जीत कर हैट्रिक लगा चुके हैं।
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अखिलेश, डिंपल, छोटे सिंह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इत्रनगरी में लोकसभा के अब तक 16 चुनाव हुए हैं। इस दौरान 11 चेहरों के सिर पर जीत का सेहरा बंधा है। उनमें से सिर्फ तीन चेहरे ही ऐसे हैं, जो अपनी जीत को दोहरा सके हैं। बाकियों को एक जीत के बाद अगली बार हार का सामना करना पड़ा है। जिन तीन लोगों ने जीत को दोहराया है, उसमें सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के नाम पर लगातार तीन जीत से इकलौती हैट्रिक का रिकॉर्ड है।
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वर्ष 1967 में हुए पहले चुनाव में कन्नौज से पहले सांसद बने डॉ. राम मनोहर लोहिया का कुछ ही महीने बाद निधन हो गया था। ऐसे में वह यहां से सिर्फ एक बार ही सांसद बने। वर्ष 1971 में हुए अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सत्यनाराण मिश्र जीते। वर्ष 1977 के अगले चुनाव में भारतीय लोकदल के टिकट पर रामप्रकाश त्रिपाठी चुनाव जीते। वह 1980 में भी लड़े, लेकिन जनता पार्टी के टिकट से लड़े छोटे सिंह यादव से चुनाव हार गए थे। वर्ष 1984 के अगले चुनाव में कांग्रेस की शीला दीखित जीत गईं और छोटे सिंह कामयाबी दोहराने से चूक गए। अगली बार 1989 के चुनाव में शीला दीक्षित अपनी कामयाबी बरकरार नहीं रख सकीं और छोटे सिंह ने उनसे पिछली हार का बदला लेकर दिल्ली का सफर तय किया।

1991 के चुनाव में छोटे सिंह जनता पार्टी के टिकट पर फिर से सांसद बने। सांसद रहते हुए लगातार चुनाव जीतने वाले पहले सांसद बने। हालांकि 1996 में वह सपा के टिकट प मैदान में उतरे। हालांकि हैट्रिक लगाने से चूक गए। इस बार भाजपा के टिकट से लड़े चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू भाजपा के टिकट पर जीत गए। भाजपा की यह पहली कामयाबी थी। इस चुनाव को हारने के बाद छोटे सिंह यादव ने फिर लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा। 1998 के चुनाव में मुन्नू बाबू कामयाबी नहीं दोहरा सके। इस बार सपा के टिकट पर लड़े प्रदीप यादव को कामयाबी मिली।

यह सीट पर सपा की पहली कामयाबी थी। अगले चुनाव में सपा के टिकट पर मुलायम सिंह यादव लड़े और जीते। उनके इस्तीफा से खाली हुई सीट पर वर्ष 2000 में उनके पुत्र अखिलेश यादव पहली बार मैदान में आए और जीते। उसके बाद उन्होंने वर्ष 2004 और 2009 में लगातार तीन जीत कर इस की पहली हैट्रिक कामयाबी लगाई। यह रिकॉर्ड अब तक उनके ही नाम है। उनके इस्तीफा से खाली हुई सीट पर वर्ष 2012 में उनकी पत्नी डिंपल यादव निर्विरोध जीतीं। 2014 के चुनाव में भी अपनी कामयाबी को बरकरार रखा। हालांकि वर्ष 2019 में वह हैट्रिक लगाने से चूक गईं।

 

अखिलेश ने लगाई हैट्रिक, डिंपल चूकीं
अखिलेश यादव: वर्ष 2000, 2004, 2009 लगातर जीते
डिंपल यादव: वर्ष 2012 और 2014 जीतीं, 2019 में हारीं
छोटे सिंह: 1989, 1991 में लगातार जीते, 1996 में हारे

यह सांसद तो बने, दोबारा नहीं लड़े
डॉ. राम मनोहर लोहिया: वर्ष 1967 में जीते, निधन के कारण अगला चुनाव नहीं लड़े
सत्य नारायण मिश्र: वर्ष 1971 का चुनाव जीते, अगला चुनाव नहीं लड़े
प्रदीप यादव: वर्ष 1998 में जीते, दोबारा नहीं लड़े
मुलायम सिंह यादव: वर्ष 1999 में जीते, दोबारा यहां से नहीं लड़े

यह सिर्फ एक बार लड़े, कामयाबी नहीं मिली तो छोड़ा मैदान
- ब्रम्हदत्त द्विवेदी: भाजपा के टिकट पर 1984 में लड़े, हारने के बाद दोबारा नहीं लड़े
- टीएन चतुर्वेदी: भाजपा के टिकट पर 1991 में लड़े, दोबारा नहीं मिला मौका
- अरविंद प्रताप सिंह: लोकतांत्रिक कांग्रेस के टिकट से 1999 में लड़े, फिर नहीं लड़े
- रामानंद यादव: भाजपा के टिकट पर 2004 में लड़े, अगली बार नहीं मिला मौका
- अशोक सिंह: बसपा के टिकट पर 1989 में लड़े, फिर सामने नहीं आए
- सूघर सिंह: बसपा के टिकट पर 1999 में लड़े, फिर सामने नहीं आए
- अकबर अहमद डंपी: बसपा के टिकट पर वर्ष 2000 का उपचुनाव लड़े, दोबारा मौका नहीं
- राजेश सिंह: बसपा के टिकट पर 2004 में लड़े, फिर नहीं मिला मौका
- डॉ. महेशचंद्र वर्मा: बसपा के टिकट पर वर्ष 2009 में लड़े, फिर नहीं मिला मौका
- निर्मल तिवारी: बसपा के टिकट से वर्ष 2014 में लड़े, दोबारा नहीं आए सामने

 
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भाजपा से लगातार टिकट पाने वाले सुब्रत इकलौते उम्मीदवार
कन्नौज का किला फतह करने के लिए भाजपा ने 2009 से पहले हर बार उम्मीदवार को बदला। वर्ष 1996 में चुनाव जीतने वाले चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू को दोबारा 1998 में टिकट मिला। हार के बाद मौका नहीं दिया गया। उसके पहले भी किसी को दोबारा मौका नहीं मिला, उनके बाद भी यही सिलसिला रहा। सुब्रत पाठक ही ऐसे हैं, जिनपर उनकी पार्टी लगातार चार बार से भरोसा जता रही है। सबसे पहले वर्ष 2009 में टिकट मिला। तीसरे नंबर पर रहे। अगली बार 2014 में भरोसा जताया गया। दूसरे नंबर पर रहे। वर्ष 2019 में भरोसा को कामयाबी में बदला तो इस बार भी टिकट उन्हें ही मिला है।
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