श्री लक्ष्मी कॉटसिन का मालिक एमपी अग्रवाल
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6833 करोड़ रुपये से अधिक की डिफाल्टर कंपनी श्री लक्ष्मी कॉटसिन पर बैंकों ने जमकर मेहरबानी बरसाई। 2013 में ही कंपनी के खाते एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट) हो गए थे। इसके बाद भी सात साल तक बैंक अफसर आंखें मूंदे बैठे रहे। कोई कार्रवाई नहीं की। और तो और खाते एनपीए होने के बाद भी यूको बैंक हांगकांग और सिंगापुर की शाखा ने 27-27 करोड़ का लोन दे दिया।
सीबीआई की एफआईआर में इसका जिक्र भी है। इसके अलावा बैंक कंपनी के एमडी को आज तक डिफाल्टर तक घोषित नहीं कर पाए। अब सीबीआई ने रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू की है। इसी क्रम में शनिवार को सीबीआई ने कंपनी के 14 ठिकानों पर छापा मारा था। टेक्सटाइल और प्रतिरक्षा उत्पाद बनाने वाली इस कंपनी ने 2005 से 2013 तक अलग-अलग बैंकों से कारोबार विस्तार के लिए 2650 करोड़ का लोन लिया था।
पेनाल्टी और ब्याज मिलाकर अब लोन की राशि छह हजार करोड़ से अधिक हो गई है। कंपनी में 2019 तक उत्पादन होता था। कंपनी को आंख मूंदकर अरबों रुपये दिए गए। बैंक ऑफ बड़ौदा ने 375 करोड़ रुपये का लोन दिया था। यह लोन 21 सितंबर 2013 को स्वीकृत दिखाया गया है। इसी तारीख को खाता एनपीए दिखा दिया गया।
दरअसल, यह गलती न होकर बैंक अफसरों की सोची-समझी रणनीति है। क्योंकि यदि एक भी खाता एनपीए होता है तो और सभी खाते एनपीए हो जाते हैं। इससे बचने के लिए बैंक ने पहले लोन स्वीकृत किया, इसके बाद खाता एनपीए किया। इसके अलावा 23 बैंकों ने अपनी बकायेदारी दिखाई है।
प्रॉपर्टी की कीमत कम, लोन दिया गया ज्यादा
बैंकों से लोन लेने के लिए कंपनी की ओर से कई गारंटर बनाए गए थे। इसमें कंपनी के चेयरमैन कम मैनेजिंग डायरेक्टर एमपी अग्रवाल के अलावा इनके निदेशकों पवन कुमार अग्रवाल, श्रद्धा अग्रवाल, देवनारायण गुप्ता, मेसर्स गैलेक्सी कैपिटल फाइनेंस, श्री लक्ष्मी डिफेंस साल्यूशन, न्यू टेक स्टील लिमिटेड, एशिया पैसिफिक लिमिटेड ने करीब 60 करोड़ से अधिक की प्रापर्टी को बैंकों में बंधक रखा और बैंकों ने अरबों रुपये का लोन दे दिया।
प्लांट मशीनरी की ब्रिकी में 1500 करोड़ की अनियमितता
कंपनी के खाते 2013 से एनपीए हो गए थे। इस बीच मामला एनसीएलटी (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) भी पहुंचा लेकिन इससे पहले ही फतेहपुर के मलवां, सौरां, रुड़की आदि जगहों पर लगे प्लांट और अन्य प्रापर्टी को मानकों के विपरीत खरीद-फरोख्त की गई।
कंपनी नियमों को ताक पर रख विदेशी वेंडरों को इसकी बिक्री कर दी गई। करीब 1500 करोड़ का इस तरह के गबन का मामला सामने आया है। इसके अलावा फंड का गलत तरीके से डायवर्जन किया गया। इसकी भी जांच की जा रही है। बैंक की विदेशी शाखाओं से लोन क्यों लिया गया। इसके पीछे की भूमिका की भी जांच की जा रही है।