कलक्टर भी यहीं पर बैठते थे। इस कारण इसे कलक्टरगंज कहा जाने लगा। शुरुआत में स्थानीय लोगों ने यहां गल्ले का व्यापार शुरू किया था। पहले दर्जन भर दुकानें थीं। अब इनकी संख्या एक हजार से ज्यादा है। पहले कलक्टरगंज से शक्करपट्टी, नयागंज जैसे क्षेत्र भी जुड़े थे। यह पूरा क्षेत्र व्यापारी वर्ग से पटा रहता था। यहां पर तीन कुएं भी थे। कुछ लोग ग्राहकों व दुकानदारों को पानी पिलाकर अपनी जीविका चलाते थे। 2004 में हाईकोर्ट के आदेश पर यहां पर लगने वाली थोक गल्ला मंडी को नौबस्ता शिफ्ट कर दिया गया। अब यहां फुटकर का बड़ा बाजार है।
1946 से होता आ रहा है भरत मिलाप
इस बाजार की खासियत यह भी है कि परेड रामलीला का भरत मिलाप कार्यक्रम यहीं होता है। हालांकि कोरोना के चलते दो साल आयोजन नहीं हुआ। इस बार आरती का कार्यक्रम हुआ। व्यापारी बताते हैं कि सामाजिक, धार्मिक कार्यों के अलावा साहित्यिक कार्यक्रम भी होते थे। वासंती नाम की संस्था व्यापारियों के सहयोग से कवि सम्मेलन कराती थी। इस प्रकार का सम्मेलन 70 के दशक तक हुआ।
बीच शहर के बाजार में आज भी आढ़त
90 साल उम्र हो गई है। 1965 के दौरान यहां पर गल्ला बैलगाड़ी में आता था। दुकानों के सामने बैलगाड़ी खड़ी होती थी और लोग खरीदारी करते थे। बाद में ट्रैक्टर और फिर ट्रकों से माल आने लगा। यहां आज भी आढ़त हैं। नए कारोबारी भी आ गए हैं। - सुरेश चंद्र दीक्षित, कारोबारी
सजता है मूर्तियों का बाजार
कलक्टरगंज बाजार के आसपास, शक्करपट्टी, नयागंज बाजार भी है। यहां पर जरूरत का हर सामान मिलता है। दिवाली से पहले यहां पर गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों का बड़ा बाजार सजता है। - कृपाशंकर त्रिवेदी, उपाध्यक्ष, कलक्टरगंज संयुक्त व्यापार मंडल
नंबर गेम
- 219 साल पुराना है यह बाजार
- 1000 से ज्यादा दुकानें हैं बाजार में