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हस्तिनापुर छोड़ कानपुर में बसेंगे 63 बंगाली परिवार: कानपुर देहात के रसूलाबाद में जमीन देखने आएगी शासन की टीम

Sat, 13 Nov 2021 04:18 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

हस्तिनापुर के बंगाली परिवारों ने सरकार से कानपुर या मेरठ में ही बसाने की अपील की थी। इसे सरकार ने स्वीकार कर लिया है। माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव से पूर्व पुनर्वासित करने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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वर्ष 1970 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) छोड़कर मेरठ के हस्तिनापुर में बसे 63 बंगाली हिंदू परिवार भविष्य में कानपुर के बाशिंदे होंगे। इन्हें कानपुर देहात के रसूलाबाद में बसाया जाएगा। यहां के भैंसाया, ताजपुर, तरसौली और पहाड़ीपुर गांवों में पहले से ही करीब 350 बंगाली परिवार करीब 50 वर्षों से रह रहे हैं।
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हस्तिनापुर के बंगाली परिवारों ने सरकार से कानपुर या मेरठ में ही बसाने की अपील की थी। इसे सरकार ने स्वीकार कर लिया है। अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह की अगुवाई में शासन की एक टीम 20 नवंबर को यहां भूमि देखने आ सकती है। माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव से पूर्व पुनर्वासित करने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।

राज्य सरकार ने बीते बुधवार को इन बंगाली हिंदू परिवारों के पुनर्वास का प्रस्ताव कैबिनेट से मंजूर कराया था। हस्तिनापुर में रह रहे विश्वजीत दास ने बताया कि बांग्लादेश विभाजन से पहले पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू परिवारों पर अत्याचार हो रहे थे। बहुत से बंगाली हिंदू जान बचाकर भारत आए थे। उस दौर में सभी को रुद्रपुर कैंप में रखा गया था।
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इसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में इन बंगाली हिंदू परिवारों को जमीन देकर विस्थापित कराया गया था। विश्वजीत ने बताया कि उनके समेत 63 परिवारों को मेरठ के हस्तिनापुर में रहने को कहा गया था। रोजीरोटी के लिए मदन कॉटन मिल में नौकरी दिलवाई गई थी। कहा गया था कि जिन्हें जमीन नहीं दी जा सकी, उन्हें नौकरी दी जा रही है।

पांच साल बाद मिल बंद हो गई और सभी परिवार बेरोजगार हो गए। वहीं मिल के आसपास ही रहने लगे। उसके बाद से इन परिवारों के लिए किसी पुनर्वास पैकेज की घोषणा नहीं की गई। करीब 45 वर्षों से ये परिवार स्थायी ठिकाने और खुद की पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब जाकर योगी सरकार से राहत मिली है। 

इसलिए कैबिनेट से मंजूरी 
बताते हैं कि प्रदेश के पुनर्वास विभाग का करीब 10 वर्ष पहले राजस्व विभाग में विलय हो गया था। विभाग से प्रस्ताव तैयार न होने की वजह से पुनर्वास पैकेज कैबिनेट से मंजूर कराया गया। 

बांग्लादेशी होने का झेलते हैं दंश 
इन बंगाली परिवारों को लोग बांग्लादेशी भी कहते हैं। वर्ष 2009 में मेरठ में सीरियल ब्लास्ट के बाद से इन पर पैनी नजर रखी जा रही है। उसी दौर में इस मांग ने तेजी पकड़ी थी कि इन परिवारों को कहीं विस्थापित कराया जाए, ताकि भविष्य में इन्हें घुसपैठिये की नजर से न देखा जाए। दरअसल, इन परिवारों की आड़ में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए भी सक्रिय रहते हैं।
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