तालग्राम। विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान होने के बाद लग्जरी गाड़ियों से प्रत्याशी सहयोगियों के साथ फर्राटा भर रहे हैं। कभी वह दौर भी था, जब लुटिया डोर, सतुआ चना, गुड़ बांध कर साइकिल से चुनाव प्रचार होता था। वर्ष 1969 में हुए चुनाव में ऊमर्दा विधानसभा से कांग्रेस के प्रत्याशी अमोलर निवासी रामरतन पांडेय साइकिल से प्रचार कर, जीत हासिल की थी।
लगभग 30 किमी क्षेत्रफल में साइकिल से टोलियों के साथ गांव-गांव पहुंचकर अपनी विचारधारा को बताना और खुद को स्थापित करने में दिन-रात एक करना पड़ा था। अब इंटरनेट मीडिया का दौर है। जहां एक खबर मिनटों में पूरे क्षेत्र में फैल जाती है। वहीं उस दौर में कोई भी खबर हफ्तों बाद समर्थकों को मिलती थी। प्रचार प्रसार के साधन सीमित रहते हुए, उस समय विधायक बनना बहुत कठिन था। इसके बावजूद रामरतन पांडेय पहले विधान सभा चुनाव में पराजित हुए, लेकिन दूसरी बार जीत दर्ज कराई थी। (संवाद)
आजादी के बाद वर्ष 1952 में पहली बार विधानसभा के चुनाव हुए थे। शुरुआती दौर में प्रचार-प्रसार के लिए साधनों और माध्यमों का अभाव था। वर्ष 1967 के चुनाव में उमर्दा विधानसभा की सीट पर रामरतन पांडेय को कांग्रेस का प्रत्याशी बनाया गया। 16304 वोट मिले, जबकि सोशलिस्ट पार्टी के होरीलाल को 16542 मत मिले थे। कांग्रेस की लहर होते हुए भी 238 वोट से पराजित हो गए थे। 1969 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने फिर प्रत्याशी बनाया था। करीब 30 किलोमीटर के क्षेत्रफल वाली इस विधानसभा में वह साइकिल से घूमे थे। चुनाव प्रचार में कुछ गिने चुने साथियों के साथ दोपहर में किसी कुएं के पास बैठ कर सतुआ, गुड़ खाकर लुटिया डोर से पानी भर कर पीते थे। इसके बाद गांव-गांव पहुंचकर अपनी विचारधारा को बताते थे। चुनाव में 20964 वोट मिले और जनसंघ के धर्मपाल सिंह को 20633 वोट मिले। 331 वोट से जीत हासिल की थी।
तहसील छिबरामऊ के अमोलर गांव निवासी रामरतन पांडेय मिलनसार थे। लोगों का दुख दर्द समझते थे। एक किसान का बेटा होते हुए अपनी मेहनत और छवि के दम पर यह मुकाम हासिल किया। मरते दम तक कार नहीं खरीद सके। बाइक भी चलाना नहीं सीख पाए। इकलौते बेटा रमेश चंद्र बताते हैं कि उन्होंने नेहरू महाविद्यालय में नौकरी के लिए आवेदन किया। ईमानदारी के चलते विधायक होते हुए भी पिता जी ने सिफारिश भी नहीं की। लोग उनको ईमानदार की लाठी कहते थे।
chunav- फोटो : KANNAUJ
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