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घरों में मनाया मातम, इमाम पर जुल्म का किया जिक्र

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झांसी। शुक्रवार को मुहर्रम सादगी से मनाया गया। शिया और सुन्नी समुदाय के लोगों ने घरों में ताजिये, ताबूत और अलम रखकर हजरत इमाम हुसैन की शहादत पर शोक प्रकट किया। लक्ष्मी ताल स्थित करबला में ताजिये विसर्जित किए।
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चेन्नई से आए शिया धर्मगुरु हयात नकवी साहब ने कहा कि 1400 साल पहले इमाम हुसैन ने संसार के सबसे बड़े आतंकवादी यजीद की बैयत स्वीकार न करके अपने 72 साथियों के साथ मक्का और मदीना छोड़कर कर्बला के मैदान में इस्लाम बचाने को कुर्बानी दी थी।
हुसैनी इमामबाड़ा मेवातीपुरा में अंजुमन अब्बासिया ने मजलिसे अजा का आयोजन किया। मजलिस ताबूत और अलम की जियारत कराई गई। मरसिया सईदुल हसन सहारनपुरी ने और नोहा नबी उल हसन, अली मेंहदी, अनवर नकवी आदि ने पढ़ा। मजलिस में इमाम-ए-जुमा मौलाना शाने हैदर, इतरत हुसैन आब्दी, कमर हसन, जफर आलम, आसिफ हैदर, शाहरुख, राहत आब्दी, नजर हैदर आब्दी आदि मौजूद रहे।
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उधर, शिया धर्मगुरु मौलाना सैय्यद शाने हैदर जैदी ने करबला में यजीद के द्वारा इमाम हुसैन पर किए जुल्मों का जिक्र करते हुए कहा कि रसूल के नवासे इमाम-ए-हुसैन ने करबला के सेहरा में तीन दिन की भूख प्यास में खुद समेत 72 चाहने वालों की जान इंसानियत को जिंदा रखने के लिए कुर्बान कर दी थीं। यजीद नामक शासक ने अपनी सौतेली मां से शादी कर ली थी। उसने इमाम हुसैन को पैगाम भिजवाया था कि बैयत कबूल कर लीजिए या कुर्बानी दे दीजिए।
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