झांसी। समथर से सात किलोमीटर दूर स्थित लोहागढ़ में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों की समाधियों की अनदेखी की जा रही है। 1857 में प्रथम स्वतंत्रता के दौरान जब झांसी की रानी झांसी से निकलकर कालपी की ओर जा रही थीं और पीछे से अंग्रेज कमांडर ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेज सैनिकों की एक टुकड़ी उनका पीछा कर रही थी, तब इस बात का पता लोहागढ़ के राजा हिंदूपत को चला तो वह अपनी सेना और नगर के अन्य योद्धाओं को लेकर लोहागढ़ की सीमा पर पहुंच गए तथा ह्यूरोज के नेतृत्व वाली अंग्रेज सैनिकों की टुकड़ी को रोक लिया, दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ तथा कई घंटे तक अंग्रेज सैनिकों को लोगगढ़ में रोके रखा गया। झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई सुरक्षित कालपी की ओर निकल गईं। इस युद्ध में लोहोगढ़ के राजा हिंदूपत की सेना के कई सैनिकं किले के परिसर में ही शहीद हो गए थे। इनके स्मारक भी बनाए गए थे पर देश स्वतंत्र होने के बाद किसी ने इन अमर शहीदों के स्मारकों की ओर ध्यान नहीं दिया और आज यह बदहाल हैं।
शहीद हुए चौबीस योद्धाओं की समाधियों की नहीं हो रही देखरेख
लोहागढ़ निवासी निरभाल सिंह बताते हैं कि सात दिन तक अंग्रेजी सेना के साथ चले युद्ध में शहीद हुए लोहागढ़ के चौबीस योद्धाओं की समाधियां अभी भी बनी हैं पर इनकी कोई देखरेख करने वाला नहीं है। राष्ट्रीय पर्वों पर भी इन पर कोई पुष्प अर्पित करने नहीं जाता है। इन स्मारकों की सरकार को मरम्मत करवाकर राष्ट्रीय त्योहारों पर इन शहीदों के सम्मान में पुष्पांजलि दी जानी चाहिए। आजाद भारत में भी आजादी के लिए सब कुछ लुटा देने वाले अमर शहीदों के स्मारकों का कोई पुरसाहाल नहीं है।
दूल्हा जू की समाधि की कराई जाए मरम्मत
लोहागढ़ निवासी चतुर सिंह यादव बताते हैं कि यूं तो लोहागढ़ के युद्ध में शहीद होने वाले चौबीस से अधिक शहीदों की समाधियां बनी हैं, पर यहां बनी रज्जब खां (दूल्हा जू) की समाधि विशेष चर्चित है। कहा जाता है कि जिस दिन युद्ध चल रहा था उसी दिन रज्जब शादी करके गांव में लौटे थे, जैसे ही उन्हें पता चला कि अंग्रेजों से युद्ध चल रहा है तो उन्होंने अपनी दुल्हन को मां के हवाले करके दूल्हे के ही रूप में युद्ध के मैदान में पहुंच गए थे, उन्होंने कई अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतारकर उनके शव काटकर बोरों में भर दिए थे। इसी युद्ध में दूल्हा जू भी शहीद हो गए थे। उनकी समाधि बना दी गई थी। हर साल यहां पर एक मेला भी लगता है, पर समाधि का समुचित संरक्षण न होने से वह अपना अस्तित्व खोती जा रही है। देश की अजादी के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले अमर शहीदों के स्मारकों की ओर शासन को ध्यान देना चाहिए।