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हॉकी ले डटकर निकलीं बेटियां, न आतंकवादियों की गोली से डरीं, न बंदिशों की बेड़ियों से...

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झांसी। हर तरफ आतंक का साया और घना सन्नाटा। कभी शोर सुनाई देता तो गोलियों की आवाज सन्नाटे को चीरकर रख देती थी। इसके बाद कहीं सिसकियां सुनाई देतीं तो कहीं सेनाआें का आर्डर कि सब अपने घरों में रहें...। ऊपर से तमाम फतवे, जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत वादियों में ऐसा खून-खराबा देख किसी की भी रूह कांप जाती है। पर इसी खौफ की घाटी में रहकर खुद को बुलंदी तक ले जाने वाली खिलखिलाती-मुस्कुराती और जोश से भरी जम्मू-कश्मीर की महिला हॉकी टीम ने वो मिसाल कायम की है। जो वादियों में डरे सहमे बसे लोगों को बताती है कि अब आतंकियों के डर और समाज की बेड़ियों से बाहर निकलिए। अपनी बेटियों को सुरक्षा दीजिए, मगर बंदिशों की बेड़ियों से उनके पैरों को मत बांधिए।
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झांसी के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में चल रही 11वीं राष्ट्रीय सीनियर महिला हॉकी चैंपियनशिप में हिस्सा लेने आई लड़कियों की जम्मू-कश्मीर हॉकी टीम ने कहा कि आतंकवाद और तमाम बंदिशों का मुकाबला करके उन्होंने अपनी मंजिल हासिल की है और नेशनल तक पहुंचीं हैं। उनमें से कई ने कभी आतंकवादियों और फतवे के डर से, कभी सीजफायर से तो कभी बुरका-हिजाब और पहनावे को लेकर तरह-तरह की बंदिशें झेली हैं। खौफ के साये में जीने को मजबूर उनके परिवार भी उनकी सुरक्षा को लेकर परेशान हुए लेकिन उन्होंने घुटने नहीं टेके और आज इस मुकाम तक पहुंच सकीं।
टीम की प्रैक्टिस सुरक्षा के दायरे में ही कराते हैं
जम्मू-कश्मीर के अभी तक जो भी हालात रहे हैं, उन हालात में लड़कियों की सुरक्षा बहुत जरूरी थी। ऐसे में हमारी टीम जब भी प्रैक्टिस करती है हम सुरक्षा के दायरे में ही रहते हैं। टीम में शामिल लड़कियां कई जगहों से आती हैं। उनमें से कई के साथ तमाम पाबंदियां भी रही हैं। कई लड़कियां हिजाब में आतीं और प्रैक्टिस के दौरान ट्रैक सूट पहनती थीं। इसलिए लड़कियों को मोटीवेट भी किया जाता है कि वे टीम और परिवार के सहयोग से खुद की प्रतिभा को पहचानें।
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प्रियंका सिंह-टीम मैनेजर, सेक्रेटरी, हॉकी इंडिया जम्मू-कश्मीर
आतंक का डर तो है लेकिन परिस्थितियां सहज हो रहीं
जम्मू-कश्मीर की स्थिति अब तो काफी ठीक हैं। टीम में शामिल कई लड़कियां अलग-अलग धर्मों से हैं। यहां की लड़कियाें को लेकर अब उनके परिवार भी बदल रहे हैं। समाज क्या कह रहा है, परिवार के लोग अब ज्यादा परवाह नहीं कर रहे। आतंक का डर तो है, लेकिन परिस्थितियां सहज हो रही हैं।
मीनाक्षी खजूरिया-कैप्टन
हमें डराते थे, ट्रैक सूट और ये खेल लड़कियों के लिए नहीं है
मैंने 2015 में खेलना शुरू किया और नेशनल तक पहुंची हूं। हमें घर से निकलने और हॉकी की ड्रेस (किट) पहनने की परमीशन नहीं थी। मुस्लिम लड़कियों के लिए तो हजारों तरह की बंदिशें थीं और अभी भी हैं, लेकिन मुझे मेरे पापा और मां ने सपोर्ट किया। मैं बाहर खेलने निकलीं तो समाज और रिश्तेदार कहने लगे कि लड़की हिजाब उतारकर खेलने जा रहीं। पापा को डराने लगे कि तमाम आतंकी घटनाएं हो रहीं, सोसायटी से डरें। ट्रैक सूट और ये खेल लड़कियों के लिए नहीं है, उन्हें घर में ही परदे में रहना चाहिए, लेकिन आज वही लोग बधाई देते हैं।
आसमां चौधरी
पुंछ में सीजफायर के दौरान बहुत खौफ था
मैंने पहले एथलीट में भी नेशनल तक खेला। जब खेलना शुरू किया तो आसानी से घर में परमीशन नहीं मिली। समाज ने भी कहा कि लड़की ट्रैक सूट पहनेगी, लड़कों के साथ खेलेगी। यहां के माहौल में ये ठीक नहीं है। मुझे मेरे दादा-दादी और भाई ने काफी सपोर्ट किया। यहां लड़कियां हिजाब के बिना बाहर नहीं निकल पाती थी। 2020 में सीजफायर के दौरान बहुत दिक्कत हुई। कई बार गोलीबारी से दहशत होती थी लेकिन मैं बिना डरे आगे बढ़ती रही।
रोजिया काजमी, पुंछ बार्डर से
आसपास के माहौल ने सबको डरा रखा था
कश्मीर में अभी तो काफी शांति है। कुछ समय पहले तो अक्सर माहौल खराब हो जाता था। लड़कियों का बाहर रहना तो बहुत ही मुश्किल था। जम्मू-कश्मीर और आसपास के माहौल ने सबको डरा रखा था। हम सभी सुरक्षा के दायरे में ही प्रैक्टिस करते हैं। परिवार भी अब सपोर्ट करता है।
शाहिस्ता शफी-कश्मीर से
लोग गोली बारूद के खौफ से बाहर निकल रहे
हमने हॉकी खेलने की शुरूआत की तो परिवार वाले चिंता करते थे। कई लड़कियों के लिए तो बहुत ही मुश्किल होती थी, लेकिन खूबसूरती के लिए मशहूर इस शहर में अब अमन दिखने लगा है लोग भी गोली बारूद के खौफ बाहर निकल रहे हैं। यहां की बेटियां भी सुकून महसूस कर पा रही हैं।
तानिया जहांगीर
ये हैं टीम में शामिल लड़कियां
हरमीत कौर, मीनाक्षी खजूरिया (कैप्टन), सरबजीत कौर, पायल शर्मा, जसप्रीत कौर, मन्नू शर्मा, बिंदू, शालू, अनुराधा, कामिनी देवी, चित्रा, शाहिस्ता शफी, सिमरनजीत कौर, तानिया जहांगीर, आसमां चौधरी, मनीषा संगराल, इंप्रीत कौर, रोजिया काजमी।
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