झांसी। कोरोना काल में मुसलमानों में शादियों के भी नियम कायदे बदल गए हैं। पहले लोग अपने लड़कों की बरात धूमधाम से ले जाकर मंडप में स्टेज पर ही निकाह कराते थे, लेकिन अब लोगों का रुझान भी बदल रहा है। वह लड़कों के निकाह मस्जिदों में भी करा रहे हैं। झांसी मंडल के तीनों जिलों में एक साल में तेजी से मस्जिदों में निकाह कराने का चलन बढ़ा है। झांसी में कोरोना काल में करीब ढाई हजार शादियां हुईं हैं। इसमें से लगभग 1230 लड़कों के निकाह जिले की अलग-अलग मस्जिदों में पढ़ाए गए। जबकि उरई में ढाई सौ और ललितपुर में दो सौ लड़कों का निकाह मस्जिदों में हुआ।
झांसी में मस्जिद जीवन शाह, मस्जिद नई बस्ती, मदनी मस्जिद ईदगाह, मस्जिद फिरदौस अलीगोल, मस्जिद खुशीपुरा, जामा मस्जिद नगरा, मरकज मस्जिद, बड़ी ईदगाह, मस्जिद कमनीग्रान, मस्जिद अमना, मस्जिद नौ नंबर, मस्जिद बाबा जी प्रेम नगर, मस्जिद छोटी छनियापुरा, मस्जिद टोरिया ओरछागेट के अलावा मऊरानीपुर, मोंठ, गुरसराय आदि क्षेत्रों में निकाह पढ़ाए गए हैं। इन मस्जिदों में मुफ्ती इमरान नदवी, मौलाना आमिल कासमी, हाफिज हफीज, मौलाना लतीफ नदवी, हाफिज नदीम, मौलाना खुर्शीद कासमी आदि ने निकाह कराया है।
मौलाना इमरान नदवी ने बताया कि पहले जिले में मस्जिदों में निकाह का चलन नहीं था, लेकिन कोरोना काल में लोगों का रुझान बदला है। हालांकि अभी बड़ी संख्या में मस्जिदों में निकाह नहीं हो रहे हैं लेकिन उलमा की तकरीरों के बाद धीरे-धीरे रुझान बदल रहा है। मस्जिदों में निकाह होने से दुल्हन और दूल्हा पक्ष के लोगों को भी आसानी रहती है। मैरिज हाल, लॉज व होटलों में बरात ले जाकर निकाह कराने से पर्दा भी नहीं रह जाता है। मस्जिद में निकाह होने से दुल्हन और दूल्हा पक्ष के वकील घर में जाकर ही लड़की से उसकी रजामंदी ले लेते हैं। वह निकाहनामा में भी लड़की के दस्तखत करा लेते हैं। इसके बाद मस्जिदों में काजी दूल्हे का निकाह कुबूल करा देते हैं।
ललितपुर में मुसलमानों की बहुत ज्यादा आबादी नहीं है लेकिन कोरोना काल में एक साल के दौरान जिले भर में आठ सौ शादियां हुईं। इनमें से दो सौ लड़कों का निकाह मस्जिदों में ही काजी ने कुबूल कराया। उलमा हमेशा शादियां सादगी से करने पर जोर दे रहे हैं। - मौलाना इब्राहीम, ललितपुर
उरई में जालौन, कालपी समेत कंचौसी आदि क्षेत्रों में बनी मस्जिदों में कोरोना काल में निकाह पढ़ाए गए हैं। इसमें कोरोना गाइड लाइन का पालन किया गया। इस दौरान एक हजार शादियां हुई हैं। इसमें से लगभग ढाई सौ दूल्हों का निकाह मस्जिदों में पढ़ाया गया है। - मोहम्मद अलीम, सामाजिक कार्यकर्ता
जिले में शादियां सादगी से करने के साथ ही दहेज का लेनदेन खत्म करने के लिए मुहिम चलाई जा रही है। यहां पर अभी डीजे के साथ बरात लाने पर निकाह न पढ़ाने का कोई एलान नहीं किया गया है लेकिन मस्जिदों में निकाह कराने की बात कही गई है। - शकील बेग रहमानी, शहरकाजी, उरई
जमात-ए-इस्लामी की तरफ से इस्लाहे मुआशरा (समाज सुधार) के जलसे होते हैं। इन जलसों में लोगों को अपने बेटे-बेटियों की शादियां सादगी से करने के लिए बताया जाता है। जमात की तरफ से भी मस्जिदों में निकाह कराने की मुहिम चलाई जा रही है। इसका असर अब दिखने लगा है।- सैयद जाहिद अली, जिलाध्यक्ष, जमात-ए-इस्लामी हिंद
दो साल में महज दो फीसदी शादियाें में ही बजा डीजे और बैंड
झांसी। उलमा के सख्त रुख का असर शादियों में दिखने लगा है। धीरे-धीरे शादियों में गैरशरई काम कम हो रहे हैं। मंगनी से लेकर शादियां तक सादगी से हो रहे हैं। दहेज का चलन भी धीरे-धीरे कम हो रहा है। दहेज का चलन बढ़ने का सबसे ज्यादा असर गरीब वर्ग की लड़कियों पर पड़ रहा था। उनके लिए अच्छे रिश्ते नहीं मिल रहे थे। शरीयत के मुताबिक मुस्लिमों में इस्लामी तरीके के अनुसार ही शादियां करना जायज है जिसके तहत शादियों में डीजे बजाना, खड़े होकर खाना, दहेज का लेनदेन के साथ ही किसी भी तरह के दिखावे पर पूरी तरह से पाबंदी है। इसके लिए शहर के उलमा के साथ ही निकाह पढ़ाने वाले काजियों की बैठकों में यह तय किया गया था कि जो शादी शरीयत के खिलाफ होगी उसमें शहर का कोई भी काजी निकाह नहीं पढ़ाएगा। उलमा का फरमान जारी होते ही काजियों ने शरीयत के खिलाफ शादियों में निकाह पढ़ाने से साफ इंकार दिया। काजियों का रुख साफ होते ही लोगों ने सादगी से शादियों को तरजीह दी है। जिले में शादियों में पांच फीसदी शरीयत के खिलाफ हुई हैं। ऐसी शादियों में शहर के काजियों की जगह बाहर से काजी को बुलाकर निकाह पढ़ाया गया है।
काजी कर चुके हैं निकाह पढ़ने से मना
लगभग नौ महीने पहले फिल्टर मार्ग स्थित एक विवाह घर में खड़े होकर खाना खिलाने से नाराज काजी ने निकाह पढ़ाने से इंकार कर दिया था। काफी मिन्नतों के बाद दूसरे काजी ने निकाह कराया था। तीन दिन पूर्व ही डीजे के संग आई बरात में भी काजी ने निकाह पढ़ाने से मना कर दिया था। अल्लाह से तौबा करने के साथ ही सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के साथ ही 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाने के बाद ही निकाह पढ़ाया गया था।
शादियों में गाना, बजाना इस्लाम में हराम करार दिया गया है। इसलिए इस तरह के काम से बाज आना चाहिए। गुनहगार का साथ देने वाला भी बराबरी का हिस्सेदार होता है। शादी सादगी से करनी चाहिए। -मुफ्ती साबिर कासमी, धर्मगुरु
शादियों में दिखावा, गाना, डीजे व बैंडबाजा, बड़े गुनाहों में शुमार है, जिसका पुरजोर विरोध करते हैं। शादी के दिन जलालत से बचने के लिए सादगी से निकाह की रस्म को अदा करें। मौलाना हाशिम, धर्मगुरु
नबी ने भी अपनी बेटी फातिमा का निकाह हजरत अली के साथ बहुत सादगी से किया था। इसलिए सभी को अपने नबी के बताए तरीकों के अनुसार ही बेटी, बेटों की शादियां करनी चाहिए। मौलाना शाने हैदर जैदी, शिया धर्मगुरु
दो साल के भीतर सिर्फ चार पांच ही मुस्लिम शादियों में बुकिंग की है। इसमें भी अधिकतर शादियां ग्रामीण क्षेत्रों में हुई हैं। मुस्लिमों में बरात में बैंडबाजे और डीजे का लगभग चलन खत्म हो गया है। मोहम्मद शाकिर, बैंड संचालक
आठ महीने पहले मुसलमानों की एक शादी में बैंड बजाया था। तब से लेकर अभी तक एक अब तक एक भी बुकिंग नहीं की है। मुस्लिमों में अब बैंडबाजे और डीजे नहीं के बराबर ही बज रहे हैं। कैलाश नारायण, डीजे संचालक