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गंदे पड़े पोखर-तालाब, पितरों का तर्पण करने घर से लोटे में ले जा रहे जल

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झांसी। मान्यता है कि पितृ पक्ष में सुबह स्नान करने के बाद नदी, तालाब या पोखर में जाकर पूर्वजों को तिल और जौ के साथ स्वच्छ जल से तर्पण देने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं, लेकिन बदलते समय के साथ अब जहां तालाब और पोखरों की गंदगी देख लोग कतरा रहे हैं। वहीं नदियों में भी शुद्ध जल नहीं रहा। ऐसे में अपने पितरों को जल देने के लिए लोग घर से लोटे (जल पात्र) में पानी भरकर तर्पण कर रहे हैं।
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रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा में स्वच्छ नदी, पोखर या तालाब के जल उपयोग किया जाता है, लेकिन समय के साथ या तो तालाब और पोखर गायब हो गए, या फिर उनका पानी इतना गंदा हो गया कि लोग उसका उपयोग करने से बचने लगे। ऐसे में नदियों का जल ही बचा था लेकिन अब वह भी गंदा होने लगा है। इससे रीति-रिवाजों और परंपरा को भी बड़ी क्षति पहुंची है। इन दिनों जब पितृ पक्ष चल रहे हैं तो लोगों को नदी, तालाब और पोखरों में स्वच्छ जल नहीं मिल रहा। ऐसे में अधिकांश लोग लोटे में पानी ले जाकर जल अर्पण कर रहे हैं। वहीं, कई लोग घर पर ही पितरों को जल अर्पण कर रहे। आंतिया तालाब में सुबह पूर्वजों को जल देने पहुंचे विजय कुमार ने भी जलपात्र से विसर्जन किया।
पितरों को खुश करने के लिए कौव्वे ढूंढ रहे लोग
झांसी। पितृ पक्ष में कौव्वों को भोजन देना शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि कौव्वों को भोजन देने से पितृ प्रसन्न होते हैं और अपने कुल को आशीष देते हैं, लेकिन लोगों को कौव्वे ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। लोगों का कहना है कि पितरों के नाम से बनाए गए भोजन का एक अंश कौव्वों को खिलाने के लिए कई घंटे इंतजार करना पड़ता है। छत या पार्क में भोजन रखने के बाद कई घंटे तक कौव्वे दिखाई नहीं देते हैं। अयोध्यापुरी के पास रहने वाली आरती बताती हैं कि कई बार तो भोजन दूसरे पक्षी खा जाते हैं। झोकन बाग की पल्लवी बताती हैं कि कोरोना काल से पहले पार्कों में कौव्वे दिखाई देते थे, लेकिन कोरोना काल के दौरान जिस तरह बर्ड फ्लू शुरू हुआ। उसके बाद से कौव्वे ज्यादा नहीं दिख रहे हैं। पल्लवी ने कहा कि सिर्फ पितृ पक्ष के दौरान ही लोग कौव्वे ढूंढते हैं, बाकी दिनों में कौव्वों को दाने-पानी के लिए मुश्किल होती है।
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पितृ पक्ष में कौओं को भोजन खिलाने से पितृ प्रसन्न होते हैं, लेकिन अब कौओं मुश्किल से ही दिखाई देते हैं।
आनंद साहू-तालपुरा
पितृ पक्ष अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए होते हैं, लेकिन आजकल साफ स्वच्छ जल भी मुश्किल हो रहा।
पारस-नगरा
आजकल तो तालाबों और पोखरों में स्वच्छ जल नहीं मिला पाता है। वहीं, कई वर्षों से कौव्वे भी कम ही दिख रहे।
देवेंद्र-सदर बाजार
बदलते समय में बहुत सारी चीजें बदल रही हैं, कम हो रहे पक्षियों की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा, कौव्वा भी उन्हीं में एक है।
संजीव-हंसारी
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