Cottage industry is in bad shape in Bapu's country, Ranipur terrycot has become a thing of the past
झांसी। जिले के रानीपुर कसबे के बुनकरों ने महात्मा गांधी के कुटीर और लघु उद्योग के सपने को साकार कर रानीपुर टेरीकॉट और जनता साड़ी जैसे ब्रांड देकर देश के कई हिस्सों में अपनी हस्तकला का लोहा मनवाया। एक से डेढ़ दशक तक देश कई हिस्सों में धूम मचाने वाले रानीपुर के कपड़े का बाजार उस समय अचानक नीचे चला गया जब सरकार ने बड़ी फैक्ट्रियों की एक्साइज ड्यूटी घटाने के साथ धागे का दाम बढ़ा दिया। इतना ही नहीं रानीपुर समेत बुंदेलखंड के अन्य क्षेत्र के हथकरघा व पावरलूम पर काम करने वाले बुनकरों को उस बड़ा झटका लगा जब सरकार ने उनके पावरलूम के लिए दी जाने वाली बिजली के बिल का फिक्सेशन हटाकर उनके पावरलूम पर व्यावसायिक मीटर लगा दिए। इसके पहले तक हर पावर लूम की एक धनराशि तय थी, यह राशि बिल के रूप में बुनकर को हर महीने जमा करना होती थी, इसमें रीडिंग नहीं ली जाती थी। पर, अचानक इस लिमिट को हटाकर बुनकरों के पावरलूमों पर व्यावसायिक बिजली मीटर लगा देने से उनके भारी भरकम बिल आने लगे। उधर, एक्साइज ड्यूटी कम होने से सूरत टांडा और बनारस की कपड़ा फैक्ट्रियों की नई तकनीक की मशीनों के सामने धागा और बिजली दोनों महंगे होने के कारण रानीपुर टेरीकॉट के पावरलूम ठहर नहीं पाए। कीमतों की प्रतिस्पर्धा में रानीपुर के बुनकर धीरे-धीरे कपड़े की गुणवत्ता से समझौता करते रहे और आज स्थिति यह है कि यहां का कपड़ा उद्योग महज तौलिया और चादर तक सिमटकर रह गया है। करीब डेढ़ दशक तक रानीपुर और आसपास के बुनकरों ने जिस तरह महात्मा गांधी के स्वदेशी और कुटीर उद्योग के विकास के सपने कोे पोषित किया वह महंगी बिजली और महंगे धागे ने तार तार कर दिया। किसी जमाने में इस क्षेत्र में सात हजार पावरलूम लगे थे जो अब महज डेढ़ हजार ही बचे हैं। प्रतिदिन सात हजार मीटर कपड़ा बनता था यानी महीने में दो लाख दस हजार मीटर कपड़ा यहां बनता था। पर, आज यह उद्योग तौलिया और चादर तक सिमट कर रह गया है।
जनता साड़ी से शुरू हुआ था रानीपुर कपड़ा उद्योग का सफर
इस व्यवसाय से जुड़े कोरी विजय कंचन बताते हैं कि रानीपुर के कपड़ा उद्योग की शुरूआत 1972 से हुई, उस दौरान यहां के बुनकरों ने हथकरघा से जनता साड़ी तैयार की, जिसने न केवल बुंदेलखंड बल्कि बाहर क्षेत्र के बाजारों में भी अपनी खूब धाक जमाई। करीब दस साल तक इस साड़ी ने बाजार में खूब धूम मचाई। इसके बाद यहां के बुनकरों ने दो कदम आगे बढ़ते हुए पेंट, शर्ट, कुर्ता पायजामा, चादर बनाना शुरू किए। इन्हें भी बाजार में हाथों हाथ लिया गया। 1982 से 1996 तक के दौर में रानीपुर टेरीकॉट ने मुंबई, सूरत और ग्वालियर की कपड़ों मिलों को कड़ी टक्कर दी। शहरों में रानीपुर टेरीकॉट के बड़े-बड़े शोरूम स्थापित हो चुके थे। इसी दौर में रानीपुर के बुनकर अब हथकरघा से बिजली से चलित पावलूम पर आ चुके थे। सरकार ने हर पावरलूम के लिए हर माह का बिजली बिल फिक्स कर रखा था, बिजली मीटर नहीं लगाए गए थे। इससे यहां के बुनकरों का धंधा खुशहाल था। अचानक 1996 में सरकार ने पावरलूमों पर बिजली मीटर लगा दिए। इससे बुनकरों पर बिजली बिलों का बोझ ठीक दोगुना हो गया। उधर, एक्साइज ड्यूटी घटने से बड़ी कपड़ा मिलों को संजीवनी मिल गई। धागे के बढ़े दाम और महंगी बिजली ने रानीपुर टेरीकॉट को धड़ाम कर दिया।
क्लस्टर प्लांट को किया जाए चालू
रानीपुर निवासी भगवानदास कोरी का कहना है कि रानीपुर कपड़ा उद्योग को फिर से पुराने स्वरुप में लाने के लिए यहां पर स्वीकृत कलस्टर प्लांट को चालू किया जाए। इससे पांच सौ बुनकर परिवारों की रोजीरोटी पर सीधा असर पड़ेगा। यहां पर कपड़े का प्रोसेसिंग प्लांट, रंगाई, डिजाइनिंग और धुलाई की व्यवस्था सरकार करे दे तो रानीपुर कपड़ा उद्योग एक बार फिर अपने पुराने स्वरूप में आ सकता है।
बिजली बिलों का फिक्सेशन फिर से बहाल किया जाए
हथकरघा व्यवसाय से जुड़े रानीपुर निवासी रामसेवक मिडइया का कहना है कि बुनकरों के उत्थान के लिए कर्ज में फंसे बुनकरों का कर्ज माफ किया जाए। पावरलूम के लिए बिजली बिलों का फिक्सेशन फिर से बहाल किया जाए। सस्ती दर पर धागा उपलब्ध कराने के साथ ही प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना के साथ क्रय मंडी में स्थापित की जाए।