झांसी। देश के महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को हमेशा बुंदेलखंड की माटी और अपने मित्रों पर गर्व रहा। यही कारण है कि उन्होंने छह वर्ष बुंदेलखंड में बिताए। वह यहां स्थानीय सहयोगियों के साथ क्रांतिकारी गतिविधियां चलाते रहे और अंग्रेज प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी।
क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान वह सबसे पहले झांसी में 1924 में आए थे। उनकी यहां सर्वप्रथम मुलाकात मुकरयाना मोहल्ला में सचींद्रनाथ बख्शी से हुई। उधर, काकोरी कांड के बाद वह फिर झांसी आए। अबकी यहां उनकी मुलाकात मास्टर रुद्रनारायण सिंह, सदाशिव राव मलकापुरकर, सीताराम भागवत, कालका प्रसाद अग्रवाल, रामानंद ड्राइवर, रघुनाथ विनायक धुलेकर, राजा साहब खनियाधाना और विश्वनाथ वैशंपायन से हुई, जो बाद में उनके अहम सहयोगी बने।
वरिष्ठ पत्रकार मोहन नेपाली बताते हैं कि इनमें से कुछ दोस्त अपने घर से रोटी, खाना और अचार छिपाकर लाते थे और चंद्रशेखर आजाद को खिलाते थे। एक बार चंद्रशेखर आजाद ने कहा भी था कि उन्हें बुंदेली भोजन से विशेष रस प्राप्त होता है। उन्हें हमेशा बुंदेलखंड की माटी और मित्रों पर भरोसा रहा, उनका यह भरोसा मरते दम तक नहीं टूटा।
बबीना में किया था बम का परीक्षण
झांसी। चंद्रशेखर आजाद ने करीब डेढ़ साल ओरछा के समीप सातार में बिताया था। एक बार महान क्रांतिकारी भगत सिंह भी उनसे मिलने सातार गए थे। इसके बाद चंद्रशेखर आजाद की सलाह पर भगत सिंह ने बबीना के जंगलों में बम परीक्षण भी किया था। उनके साथ मास्टर रूद्रनारायण एवं सदाशिव राव मलकापुर भी थे। इस परीक्षण के बाद ही भगत सिंह ने नेशनल असेंबली में बम विस्फोट किया था।
झांसी में है मां जगरानी देवी की समाधि
झांसी। चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने के बाद उनकी मां जगरानी देवी गुमनाम जीवन जीने को मजबूर हो गईं। उन्हें अपने गांव में लकड़ी व कंडे बेचकर जीवन यापन करना पड़ा था। यह देख आजाद के मित्र व सहयोगी सदाशिव राव मलकापुरकर उन्हें अपने साथ झांसी ले आए और अपनी मां की तरह उनकी सेवा की। उन्हें चारों धाम की यात्रा भी कराई। 22 मार्च 1951 में जगरानी देवी का निधन हो गया तो बड़ागांव गेट बाहर स्थित मुक्तिधाम में उनकी अंत्येष्टि भी की। बाद में झांसी वासियों ने उनकी समाधि बनवा दी। जो आज भी मौजूद है।