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जौनपुर में तीन सगी बहनें ट्रेन के आगे कूदीं: मां देख नहीं सकती, नौ साल पहले पिता की मौत, गरीबी से परेशान था परिवार

Fri, 19 Nov 2021 08:28 PM IST
उत्पल कांत अमर उजाला नेटवर्क, जौनपुर

सार

वाराणसी-सुल्तानपुर रेल प्रखंड पर फत्तूपुर रेलवे क्रॉसिंग के पास गुरुवार की देर रात्रि में तीन सगी बहनों ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली।
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पीड़ित परिवार के घर पहुंचे ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के जौनपुर में मां की डांट से नाराज तीन सगी बहनों ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी। महाराजगंज थाना क्षेत्र के अहिरौली गांव निवासी तीनों बहनों के पिता राजेंद्र गौतम की नौ साल पहले टीवी से मौत हो गई थी। मां आशा देवी दृष्टीहीन हैं।  किसी तरह परिवार का गुजारा होता था। मजदूरी के पैसों से किसी तरह घर का खर्च चलता था।  
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अहिरौली गांव के दलित बस्ती निवासी आशा देवी का परिवार कर्ज तले दबा था। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसे यह दिन देखना होगा। जिसे बताते हुए वह फूट-फूट कर रोने लगती हैं, क्योंकि उसने पहले पति, फिर दोनों आंख और अब तीन बेटियां को खो दिया है।  

रिश्तेदारों की  मदद से की थी बड़ी बेटी की शादी
अहिरौली गांव निवासी राजेंद्र गौतम की पांच बेटी रेनू (19), ज्योति (17), प्रीति (16) आरती(14) काजल(11) और एक बेटा गणेश (18) हैं। राजेंद्र गौतम टीबी का मरीज था। गरीबी के बाद भी आशा मजदूरी करके परिवार और पति की दवा कराती थी। साथ बच्चों की परवरिश करती थी।
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पढ़ेंः खौफनाक कदम: जौनपुर में 3 सगी बहनों ने ट्रेन के आगे कूदकर दी जान

मृतका के परिवार के लोग - फोटो : अमर उजाला
जिसे देखते हुए ननद कलावती ने उसकी दूसरी बेटी ज्योति को अपने पास परऊपुर थाना सिंगरामऊ बुला ली थी, जो वहीं रहकर कक्षा आठ तक पढ़ाई की और फिर बुआ के साथ घर की कामकाज संभालती है। इधर साल राजेंद्र को समचुति इलाज न मिल पाने के कारण टीबी 2012 में मौत हो गई।

पति की मौत के बाद आशा पर जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ गया और वो लोगों के घरों और खेतों में कामकाज करती थी। पूर्व में हुए उसके आंख के आपरेशन के बाद भी दोनों आंखों से दिखाई देना बंद कर दिया।  चारों बेटियां लोगों के खेतों में कामकाज करती थी, जबकि गणेश लोगों के बुलाने पर दिहाड़ी पर मजदूरी कर लेता है।

इस तरह परिवार का किसी तरह खर्च चलता था। इसी साल 30 मई को आशा देवी ने बड़ी बेटी रेनू की शादी दारापुर चांदा जिला सुल्तानपुर निवासी शनि के साथ की थी। लेकिन, इसके लिए रिश्तेदारों से मदद और कर्ज भी लेने पड़े थे। इससे पूर्व से भी लिए कर्ज की रकम लगभग लाख रुपये के आसपास पहुंच गई।

छप्पर में बैठकर बिलखती रहीं मां

पति की मौत के बाद आशा देवी ने आंख में दर्द होने पर ऑपरेशन कराया। वह पिछले पांच साल से दोनों आंखों से नहीं देख पाती हैं। वह छप्पर में बैठी शुक्रवार को रोती बिलखती रहीं।  परिवार को सरकारी मदद के नाम पर गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाला सफेद राशन कार्ड मिला है।

जबकि परिवार अन्त्योदय कार्ड के लिए पात्र हैं, जिसमें नि:शुल्क खाद्यान्न मिलता है। इतना ही नहीं, जो राशन कार्ड जारी भी हुआ उसमें तीन यूनिट का खाद्यान्न दिया जा रहा है। ऐसे में आशा बताती है कि 48 रुपये में उसे 15 किलो खाद्यान्न हर माह मिलता है, जिससे लंबा परिवार होने के कारण घर का खर्च तक नहीं चल पाता। ऐसे में काजल, आरती और प्रिती ही अपनी बड़ी बहन रेनू के साथ मिलकर लोगों की खेतों में काम करके परिवार का खर्च चलाती थी। आशा को 500 रुपये विधवा पेंशन मिलती हैं। 

भाई के साथ-साथ परिवार का भी खर्च उठाती थी तीनों बहनें

जौनपुर के गांव की घटना - फोटो : अमर उजाला
अहिरौली के दलित बस्ती में शुक्रवार को मातमी सन्नाटा पसरा हुआ रहा। स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद गौतम के घर उनकी तीन बेटियों के ट्रेन से कटकर मरने की खबर के बाद से कोहराम मचा हुआ है। मृतक किशोरियों की दोनों आंखों से सूर मां आशा देवी के आंखों से आंसू तो पहले से ही मर चुके हैं, लेकिन वो तड़प-तड़प कर रो रही है। बीच-बीच में अचेत हो बेहोश सी हो जा रही थी, जिसे आसपास की महिलाएं परिवार के लोग संभालते नजर आ रहे थे।

पिता की नौ साल पहले मौत, फिर पांच साल पहले मां की दोनों आंखें खराब होने के बाद बेटी प्रीती (16), आरती (14) व काजल (11) ही परिवार का खर्च चलाती थी। साथ ही मानसिक रुप से कमजोर भाई गणेश की भी देखरेख करती थी। घटना के बाद लोग दबी-जुबान से तरह-तरह के कयास लगा रहे थे। हालांकि ज्यादातर लोगों का कहना था कि गरीबी से तंग आकर तीनों बहनों ने तो कहीं यह कदम नहीं उठा लिया।
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आखिर यह सब कैसे हुआ?

मृत किशोरियों के बड़े पिता राजाराम का कहना है कहते हैं कि रात में जैसे ही घटना की जानकारी मुझे हुआ हमलोग चौंक गए। क्योंकि, कुछ समझ में नहीं आ रहा, आखिर यह सब कैसे हुआ। परिवार में कोई बात ऐसी बात ही नहीं हुई थी कि बेटियां ऐसा कदम उठा लें। कुछ इसी तरह मृतक किशोरियों की मां आशा का कहना है। वह बार-बार यही कहती थी, बेटियां रोज की तरह खाना बनाई, खाई और खिलाई। इसके बाद मेरे पास सोने भी आई।

हालांकि रात में सात बजे के बाद बुलाने पर नहीं बोली तो लगा कि बगल वाले मच्छर में सोने चली गई होंगी या बड़े अपने बड़े पापा के घर। किसी प्रकार का अंदेशा न होने के कारण मैं सो गई थी। लेकिन रात में जैसे ही पता चला मेरे तो होश ही उड़ गए। दूसरी ओर घटना की जानकारी होने पर बुआ के घर रहने वाली ज्योति और ससुराल से रेनू भी दोपहर आ गई, जिनका रो-रोकर बुरा हाल था। दोनों का कहना था उनके कुछ समझ में नहीं आ रहा आखिर यह सब कैसे हो गया।
 
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