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खेती में लगाया ज्ञान तो बन गए मॉडल किसान

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रजनीश सिंह की फोटो। - फोटो : JAUNPUR
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जौनपुर। खेती को घाटे का सौदा कहने वालों को नवापुरा के रजनीश सिंह से प्रेरणा लेने की जरूरत है। एमबीए की पढ़ाई के बाद नौकरी छोड़ घर लौटे रजनीश ने जब अपने ज्ञान को खेती में लगाया तो वही खेत उनकी तरक्की का जरिया बन गया। वह जिले के उन चुनिंदा मॉडल किसानों में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने खेती के बल पर सफलता की नई कहानी लिखी है।
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रामनगर ब्लाक के नवापुरा निवासी रजनीश सिंह की पारिवारिक पृष्ठभूमि खेती से ही जुड़ी रही है। पिता भी जैविक तरीकों से ही खेती करते थे, लेकिन उनका तौर-तरीका पारंपरिक था। कड़ी मेहनत के बाद भी अच्छी आमदनी के लिए वह परेशान रहते थे। एमबीए की पढ़ाई करने वाले रजनीश के लिए खेती करना कठिन फैसला था, मगर पिता के निधन के बाद हालात के आगे विवश होकर वह घर लौट आए। नौकरी छोड़कर पुरखों की परंपरा को ही आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। उन्होंने खेती को विविधीकरण से जोड़ा। अनाज के अलावा फल-सब्जी, बागवानी, औषधीय पौधे, मत्स्य पालन, गोपालन, बर्मी कंपोस्ट आदि की भी शुरुआत की।
महज सात एकड़ के क्षेत्रफल में वह हर तरह की खेती कर रहे हैं। अपने उत्पादों को बाजार में सही तरीके से पहुंचाने के लिए वह खाद्य प्रसंस्करण भी कर रहे हैं। कद्दू, संतरा, पपीता, आंवला, आम, अमरूद, अनार, नींबू, लीची आदि के माध्यम से अलग-अलग स्वाद का पेठा, मुरब्बा, जैम, कैचअप, मिठाई आदि तैयार कर बाजारों में बेच रहे हैं। आठ माह पहले इसकी शुरुआत की। महिलाओं के छोटे-छोटे समूह बनाकर उन्हें भी इस कार्य से जोड़ा है। करीब डेढ़ सौ से अधिक महिलाएं घर बैठकर ही प्रसंस्करण के जरिए उत्पाद तैयार कर रजनीश को उपलब्ध कराती हैं, जिसकी पैकिंग कराकर वह अलग-अलग बाजारों में बिक्री कर रहे हैं। जौनपुर के अलावा वाराणसी, रायबरेली, सुल्तानपुर सहित अन्य क्षेत्रों में उनके माल की बिक्री खूब हो रही है। खेती में नए प्रयोगों के लिए उन्हें कई सम्मान भी मिल चुके हैं।
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दूसरों से गोबर खरीद बना रहे खाद
अन्य किसानों के लिए गोबर भले ही समस्या हो, लेकिन नवापुरा व आसपास के किसानों को इससे आमदनी हो रही है। वह पशुओं के गोबर को 68 पैसे प्रति किलो की दर से रजनीश को बेच रहे हैं। इस तरह से गोबर एकत्रित कर वह बर्मी कंपोस्ट बनाकर बाजार में बेचते हैं। अपने खेतों में भी इसी खाद का इस्तेमाल करते हैं। उनका कहना है कि जैविक खेती की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है। जो लोग खुद बर्मी कंपोस्ट नहीं बना पाते, वह हमसे खरीदते हैं। जैविक खेती का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें लागत नाममात्र की होती है और उत्पादित फसलों में पोषण भरपूर होता है। बाजार में इसकी डिमांड भी अच्छी होती है।
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तरीका बदलिए, खेती में मुनाफा कमा सकते हैं
रजनीश का कहना है कि एमबीए के बाद जिस कंपनी में नौकरी करते थे, वहां अचार-मुरब्बा, मसाला जैसे उत्पाद भी तैयार होते थे। वहां का अनुभव काफी काम आया। सीधे उपज को बाजार तक पहुंचाने की बजाय उसे प्रसंस्करित कर बेचना ज्यादा फायदेमंद है। उदाहरण के तौर पर कद्दू को लें तो सामान्य रुप से बाजार में कद्दू का बहुत अच्छा दाम नहीं मिलता, लेकिन पेठा बनाने और उसे उससे विविध रूप से तैयार करते ही उसकी डिमांड बढ़ गई है। सिर्फ पेठा के लिए ही कद्दू की इतनी जरूरत होती है कि उन्हें बिहार, श्रावस्ती सहित अन्य जिलों से कद्दू मंगाना पड़ता है। यहां के किसान भी चाहें तो इससे अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। खेती में कमाई की बहुत संभावनाएं हैं, बस सोच और तरीका बदलने की जरूरत है।

रजनीश सिंह द्वारा बनाया गया मुरब्बा। संवाद- फोटो : JAUNPUR

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