उरई। बात लोकतंत्र के सबसे बड़े त्योहार लोकसभा चुनाव और सांसदी की हो और जनपद के चौधरी परिवार का नाम न लिया जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता है। भले ही आज इस चौधरी परिवार में कोई सांसद-विधायक न हो लेकिन आजादी के जश्न के बाद से ही 37 वर्षों तक सांसदी इसी चौधरी परिवार की धरोहर कही जाती थी। फिर वह चाहे जनपद के पहले सांसद ही क्यों न हो, सभी इसी परिवार से रहे हैं। सांसद बनने से शुरू हुआ यह सफर 2017 तक पालिकाध्यक्ष बनने तक कायम भी रहा। कुल मिलाकर यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि आजादी के बाद से ही सियासत चौधरी परिवार की विरासत रही है। यही कारण है कि पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा और राहुल गांधी तक सभी की चौधरी परिवार से करीबी भी रही है।
1975 से करीब 20 साल तक कांग्रेस के नगर अध्यक्ष रहे रामप्रकाश द्विवेदी ने बताया कि आजादी के बाद पहली बार सन् 1952 में हुए लोकसभा चुनाव में परिवार के पहले सदस्य यानी लोटनराम कांग्रेस प्रत्याशी के रुप में चुनाव मैदान में उतरे थे। उस वक्त का चुनाव दल पर नहीं सिर्फ चाल, चेहरे और चरित्र पर लड़ा जाता था और यह तीनों खूबियां लोटनराम में मौजूद थी, लिहाजा जनपद का प्रथम सांसद बनने में उनके आड़े कोई बाधा नहीं आई और वे शानदार मतों से चुनाव भी जीते। यहीं से परिवार की राजनीतिक विरासत बननी शुरू हुई।
लोटनराम के बाद सन् 57 में उनके छोटे भाई लच्छीराम ने कांग्रेस से ही चुनावी मैदान संभाला और जीत दर्ज की। सांसदी की यह मशाल यहीं नहीं थमी फिर आगे बढ़ते हुए लोटनराम के बेटे रामसेवक चौधरी के हाथ में पहुंची तो उन्होंने ने भी 62 से जो जीत का सिलसिला शुरू किया, वह जाकर सन् 77 में खत्म हुआ, रामसेवक इस दौरान न सिर्फ तीन बार सांसद रहे बल्कि सरकार में केंद्रीय मंत्री भी बनाए गए।
सन् 77 में कांग्रेस का विजयी रथ रुका और भारतीय लोकदल के रामचरन सांसद चुने गए लेकिन परिवार की विरासत यहीं समाप्त नहीं हुई और एक बार फिर सन 84 में परिवार के पूर्व सांसद लच्छीराम ही कांग्रेस से चुनाव मैदान में उतरे और भारी मतों से चुनाव में जीत भी दर्ज की। यह बात और है कि 89 के बाद से परिवार के पास सांसदी नहीं आई लेकिन राजनीति का जोश और जुनून खत्म नहीं हुआ। परिवार के दो सदस्य विजय चौधरी और श्याम सुंदर चौधरी पुत्र पूर्व सांसद लच्छीराम आज भी राजनीति में सक्रिय हैं। श्याम सुंदर चाचा और विजय उनके भतीजे हैं।
अंग्रेजों के जमाने के सांसद थे लोटनराम
आजाद भारत में भले ही पहला लोकसभा चुनाव सन 1952 में हुआ हो किंतु चौधरी परिवार के लोटनराम तो 1935 में ही सांसद बन चुके थे, उन्हें आजादी से पहले अंग्रेजों ने ही ट्रायल एसेंबली का सदस्य बना दिया था। यहीं कारण था कि जब आजाद भारत में चुनाव हुए तो जनपद से बतौर प्रत्याशी उनका नाम सबसे ऊपर था।
हैट्रिक बनाने वाले अकेले रामसेवक
यूं तो अब तक हुए 16 लोकसभा चुनाव में भाजपा के सांसद भानु प्रताप चार मर्तबा जीत दर्ज कर चुके हैं, लेकिन हैट्रिक सिर्फ चौधरी परिवार के रामसेवक के नाम ही है। रामसेवक ने सन 62, 67 और 71 के तीन लगातार चुनाव जीतकर हैट्रिक का ऐसा रेकार्ड बनाया, जिसे अभी तक कोई भी नहीं तोड़ सका है।
पालिकाध्यक्षी के बाद थमी राजनैतिक विरासत
यूं तो सन 89 के बाद परिवार के सदस्य विजय चौधरी दो तीन बार लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन 2013 में विजय चौधरी की माताजी गिरजा चौधरी पालिकाध्यक्ष बनी और 2017 तक कुर्सी पर काबिज भी रही। इस बीच में बसपा के दिग्गज नेता रहे विजय चौधरी ने राहुल के करीबी होने का लाभ लेते हुए 2014 में कांग्रेस से लोकसभा का चुनाव लड़ा और हार गए। सन 2017 में चौधरी वापस बसपा से विधानसभा चुनाव लड़े और यहां भी हार का सामना करना पड़ा।
वर्तमान में चाचा-भतीजा, दोनों अलग-अलग दलों से
वर्तमान में पूरा चौधरी परिवार उरई के शहीद भगत सिंह चौराहे के निकट स्थित मकान में रहता है, यह बात जरूर है कि आज मकान की छत पर एक साथ एक नहीं बल्कि दो-दो दलों के झंडे फहरा रहे हैं। विजय चौधरी बसपा के सक्रिय नेता है और पूर्व सांसद लच्छीराम के बेटे चौधरी श्याम सुंदर काफी समय से कांग्रेस के जिलाध्यक्ष है। लिहाजा दो दलों के झंडे यूं कहे कि चौधरी परिवार की पहचान बने हैं तो गलत न होगा।