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यूपी की 'कुकर्म कथा' सुना रहे ये आंकड़े

Thu, 11 Jul 2013 03:48 PM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
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प्रदेश की राजधानी में 2012 में दर्ज 24 लड़कियों से दुराचार की घटनाओं में 22 पीड़ित 18 वर्ष से कम उम्र की थीं।
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इनमें से 10 की उम्र 14 से भी कम थी। गोमतीनगर ने सोमवार को हुई दरिंदगी झिंझोड़ती है। प्रदेश के साथ राजधानी में गत वर्षों में हुई दुराचार की घटनाएं सभ्य समाज को शर्मसार करती हैं।

टार्गेट पर नाबालिग बच्चियां
आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि ज्यादातर मामलों में टारगेट नाबालिग बनीं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2010 में शहर में दुराचार पीड़ितों में 17 प्रतिशत की उम्र 18 वर्ष से कम थी।
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90 फीसदी रेप विक्टिम नाबालिग
2011 में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत हो गया और 2012 में 90 प्रतिशत पीड़ित 18 वर्ष से कम उम्र की थीं। कमोबेश पूरे प्रदेश के हालत कुछ ऐसे ही हैं। 2012 में देश भर में 36 प्रतिशत दुराचार पीड़ित नाबालिग थीं, जबकि प्रदेश में यह आंकड़ा 53 प्रतिशत रहा।

2011 में देश में जहां 30 प्रतिशत, वहीं प्रदेश में यह 53 प्रतिशत रहा। इन हालात में बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ रही है।

पुलिस का रवैया बेशर्मी भरा
सामाजिक कार्यकर्ता व ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमन एसोसिएशन की पदाधिकारी ताहिरा हसन गोमतीनगर की घटना पर बेहद अफसोस जताती हुए पुलिस के रवैए को बेशर्मी भरा बताती हैं।

ताहिरा के अनुसार पुलिस पीड़ितों की नहीं सुनती, खासतौर से अगर पीड़ित गरीब हो तो उससे ढंग से बात भी नहीं की जाती।

उल्टा दुत्कार रही है पुलिस
जरा सोचिए उस मां पर क्या बीती होगी? जिसकी बेटी को रात में कोई उठा ले गया और पुलिस मदद की जगह उसे दुत्कार रही है। यही नहीं शव मिलने पर भी रिपोर्ट लिखकर पोस्टमार्टम की जगह चुपचाप अंतिम संस्कार का दबाव बनाया जाता है।

उसे पीड़ित को ही छोड़ना पड़ा शहर
समीक्षा संस्था की लखनऊ डायरेक्टर अंजलि सिंह हुसैनगंज क्षेत्र के हाल के एक मामले का उदाहरण देती हैं कि 13 साल की बच्ची को कॉलोनी का ही एक युवक छेड़ा करता था।

पहले स्कूल तक पीछा किया, फिर एक दिन दुराचार का प्रयास किया। बच्ची किसी तरह से खुद को छुड़ाकर घर पहुंची। शिकायत के बावजूद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।

पीड़िता के घर जा पहुंची पुलिस
अंजलि बताती हैं कि आमतौर पर पुलिस आरोपियों से पैसा लेकर चुप्पी साध लेती है, यहां भी वहीं हुआ। उन्होंने कोर्ट के जरिए मामला दर्ज करवाया तो एक दिन पुलिस आरोपी के नाम का समन लेकर पीड़ित परिवार के ही घर जा पहुंची।

8-9 पुलिस वालों ने ऐसा खौफ पैदा किया जैसे खुद पीड़ित परिवार ही आरोपी को छिपाए हो। घर का बाथरूम तक तलाशा गया। इन हालात में कोई परिवार भला कैसे हिम्मत करेगा व्यवस्था से लड़ने की।

दूसरे शहर में कर रही है पढ़ाई
लड़की ने आज शहर छोड़ दिया है और दूसरे शहर में जाकर पढ़ाई कर रही है। दूसरी तरफ थानों में व्यावहारिक जानकारी रखने वाली जुवेनाइल पुलिस नहीं है, काउंसिलिंग सेंटर्स नहीं हैं।
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एफआईआर लिखने को पुलिस तैयार नहीं होती। ऐसे में वे लोग जो मानसिक तौर पर बीमार हैं और बच्चों को अपना शिकार बना रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई तक नहीं हो पा रही है।
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