न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
कस्बा मुरसान स्थित सब्जी मंडी के निकट झाड़ियों के अंदर कचरे के ढेर पर खड़ी प्रतिमा किसी आम आदमी या नेता की नहीं, बल्कि महान स्वाधीनता सेनानी राजा महेंद्र प्रताप सिंह की है। इनके नाम पर अलीगढ़ में बनने वाले विश्वविद्यालय का शिलान्यास करने के लिए 14 सितंबर को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आ रहे हैं, लेकिन अफसोस की बात है कि इतनी बड़ी शख्सियत की इस प्रतिमा की उनके अपने ही घर में कोई सुधि लेने वाला नहीं है।
32 साल देश से निर्वासित रहकर लड़ी थी आजादी की जंग
हाथरस। राजा महेंद्र प्रताप महान स्वाधीनता सेनानी थे। उनका जन्म एक दिसंबर 1886 को मुरसान के शाही परिवार में हुआ था। वह राजा घनश्याम सिंह के तीसरे पुत्र थे। जब वह तीन साल के थे, तब हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने उन्हें बेटे के रूप में गोद ले लिया था। ऐसे में राजा महेंद्र प्रताप हाथरस राज्य के भी राजा बने। 1902 में उनका विवाह बलवीर कौर से हुआ था, जो जींद रियासत के सिद्धू जाट परिवार से थीं। राजा महेंद्र प्रताप के विचार शुरू से ही अंग्रेजी शासन के खिलाफ थे। इस कारण अंग्रेजों ने उन्हें राजा बहादुर की उपाधि नहीं दी थी।
राजा साहब हमेशा सोचते थे कि क्यों न मुल्क अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो। 1914 में जब पूरा यूरोप विश्व युद्ध की आग में जल रहा था, तब उन्होंने यह योजना बनाई कि क्यों न विदेश में जाकर स्वाधीनता आंदोलन को गति दी जाए। 10 फरवरी 1915 को वह मोहम्मद पीर के छद्म नाम से स्विटरलैंड होते हुए बर्लिन पहुंचे। एक दिसंबर 1915 को उन्होंने अफगानिस्तान के काबुल में आजाद हिंद सरकार की स्थापना की। राजा साहब ने 32 साल तक देश से निर्वासित रहकर आजादी की जंग लड़ी। देश की आजादी के बाद वह वर्ष 1957 में मथुरा से सांसद भी चुने गए। इस चुनाव में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को हराया था।
शिक्षा के क्षेत्र में रहा अहम योगदान
हाथरस। राजा महेंद्रप्रताप महान समाजसुधारक थे। शिक्षा के क्षेत्र में उनका बड़ा योगदान रहा। उन्होंने वृंदावन में वर्ष 1909 में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की। यह तकनीकी शिक्षा का केंद्र था। उन्होंने प्रेम धर्म भी चलाया और इसी नाम राष्ट्रीय पत्र भी निकाला। एएमयू के लिए भी उन्होंने काफी जमीन दान में दी थी। उनके नाम से सरकार अलीगढ़ में विश्वविद्यालय बनाने जा रही है। संवाद