हाथरस : हैंडलूम की मशीन पर काम करता मजदूर (फाइल फोटो)
- फोटो : HATHRAS
आए दिन बदतर होते जा रहे हालात और सरकारी उपेक्षा ने हाथरस के कॉटन और उससे जुड़े उद्योगों का दम निकाल दिया है। कभी यहां चार कॉटन मिलें थीं। हजारों लोग इनमें काम करते थे। आलम यह था कि इन मिलों में ट्रेनें तक जाती थीं। लेकिन अब यह उद्योग ट्रांसपोर्टेशन के साधनों को तरस गया है। पर्याप्त बिजली भी नहीं मिल पाती। हालत यह है कि कारोबारी इस उद्योग को समेटने में लगे हैं।
कानपुर के बाद हाथरस का कॉटन उद्योग प्रदेश में दूसरे नंबर पर आता था। इसकी वजह यह थी कि यहां आसपास कपास की खेती होती थी। कपास से कॉटन मिलों में रुई बनती थी। फिर रई का तरह-तरह से प्रयोग होता था। अब सभी मिलें बंद हो गईं। इन मिलों की जगह कालोनियां बन गई हैं। उसके बाद घाटे से उबारने के लिए सरकार के हथकरघा निगम ने बिजली कॉटन मिल को टेकओवर भी कर दिया। फिर भी यह मिल घाटे में चलती रहीं। अब मिलें ही गायब हो गई हैं।
अब रुई बाहर से आती है यहां
इस दौरान यहां उद्यमियों ने अपनी फैक्टरियां लगानी शुरू कर दीं। कॉटन यार्न, हैंडलूम और पावरलूम की फैक्टरियां यहां शुरू हो गईं। रुई को मंगाकर यहां धागा तैयार होता है। पावरलूम फैक्टरियों में धागों से खेस और चादर सहित अन्य तरह के कपड़े आदि तैयार होते हैं। हैंडलूम फैक्ट्रियों में गलीचा, दरी, बाथमेट्स आदि तैयार होता है। यहां से माल का निर्यात भी कई देशों को होता है। कच्चा माल पानीपत, दिल्ली सहित अन्य इलाकों से आता है। पावरलूम माल की देश की काफी इलाकों में खपत है।
उद्योग को पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही है। यहां पर ट्रासंपोर्टेशन के पर्याप्त इंतजाम नहीं है। दिन पर दिन सूत के दामों इजाफा हो रहा है। इस उद्योग एक जिला एक उत्पाद में शामिल किया जाएगा, ताकि यह उद्योग फिर से रफ्तार पकड़ सके। पहले 80 पावरलूम थे अब 10-15 पावर लूम रह गए हैं।
- वासुदेव माहौर, उद्यमी
ट्रांसपोर्ट महंगा हो गया है। लागत भी महंगी हो गई है। लेबर के रेट हाई हो गए हैं। इस समय एक्सपोर्ट भी सुस्त चल रहा है। माल की बिक्री भी प्रभावित हो रही है। सरकार के हैडंलूम हाउस थे। सोसायटी के जरिए माल खरीदा जाता था। अब सब बंद हो गए हैँ। सरकार को हैंडलूम उद्योग पर ध्यान देना चाहिए।
- कुमोद माहेश्वरी, उद्यमी