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हाथरस : गंदे नाले का पानी पी रहे हिरन, हो रहे बीमार

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हाथरस : सिकंदराराऊ के जंगलों में विचरण करते हिरन। संवाद - फोटो : SIKANDHRA RAHU
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राकेश वार्ष्णेय
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सिकंदराराऊ। कासगंज रोड स्थित ग्राम सभा एचोला शहादतपुर और टटी डंडिया के बबूल के जंगलों में विचरण करने वाले कई प्रजातियों के हिरनों को संरक्षण की दरकार है। आसपास के ग्रामीणों के संरक्षण में पल रहे इन हिरनों की संख्या साल-दर-साल तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इनके संरक्षण के लिए जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने की तरफ जिला प्रशासन और वन विभाग का कोई ध्यान नहीं है।
कई वर्षों से इन हिरनों के पीने के लिए पानी का इंतजाम करने की योजना बन रही है, लेकिन इसके नाम पर कच्चे तालाब की खोदाई करके इतिश्री कर दी गई। यह तालाब आज तक सूखा पड़ा है। उसे पानी से भरने का कोई इंतजाम नहीं किया गया है। यह हिरन आज भी नाले और गड्ढों में भरा गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं। भूख मिटाने के लिए यह वन्य जीव खेतों में उग रही घास पर निर्भर हैं।
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ग्राम सभा एचोला शहादतपुर और टटी डंडिया के ग्रामीण बताते हैं कि कई वर्षों पहले आगरा के बाह और बरहन क्षेत्र से कुछ हिरन भटकते हुए यहां तक पहुंचे थे। आसपास के गांवों में बबूल के पेड़ के जंगल इनकी शरण स्थली बन गए। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती रही। वर्तमान में एक हजार से ज्यादा विभिन्न प्रजाति के हिरन इन जंगलों में विचरण करते नजर आते हैं। संवाद
इन प्रजातियों के हिरन करते हैं विचरण
क्षेत्र में खासतौर पर ब्लैक बग (काला हिरन), सफेद हिरन, बारहसिंगा, और चीतल प्रजाति के हिरन मौजूद हैं। एक सफेद हिरन तो कुछ वर्ष पूर्व यहां के जंगलों में देखा गया था, लेकिन इसके बाद वह लुप्त हो गया। चीतल के बारे में कहा जाता है कि जब सूर्य की किरणें इस पर पड़ती हैं तो यह सोने जैसा नजर आता है। वर्तमान में यहां काले हिरनों की संख्या 100 से ज्यादा बताई जाती है।
कुत्तों से जान का खतरा
कुत्ते इन हिरनों के लिए खतरा बने हुए हैं। अक्सर कुत्ते झुंड में आकर इनका शिकार करते हैं। इनकी सुरक्षा के लिए यहां कैटल गार्ड नियुक्त करने की मांग भी उठी, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ।
सोलर पंप से दूर हो सकती है पानी की कमी
ग्रामीणों का कहना है कि बबूल के जंगलों में बिजली न होने से पंप से पानी मिलना मुश्किल है। अगर यहां एक सोलर पंप लगाकर पक्की हौदियां बना दी जाएं और साफ पानी से भर दिया जाए तो हिरनों के लिए पीने के पानी का इंतजाम हो सकता है।
हिरनों से लगाव के चलते फसलों का नुकसान भी सह लेते हैं किसान
ग्राम प्रधान एचोला शहादतपुर राजेश कुमार और ग्राम प्रधान टटी डंडिया अमित सिंह पुंढीर का कहना है कि क्षेत्र के किसानों का इन हिरनों से इतना लगाव है कि फसलों को चरने पर भी वह इन्हें कुछ नहीं कहते। कई बार वन विभाग से लेकर अनेक विभागों की बैठकें हिरनों के संरक्षण को लेकर हो चुकी हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर नतीजा सिफर ही रहा है। ग्राम पंचायत स्तर से जितना संभव होता, उतनी सुविधा वह हिरनों के लिए मुहैया करा देते हैं।
अभयारण्य बनाने से मिल सकता है संरक्षण
अगर प्रशासन और वन विभाग ध्यान दे तो यह क्षेत्र हिरनों के अभयारण्य के रूप में विकसित हो सकता है। हिरनों की सुरक्षा के लिहाज से पहले तो इस क्षेत्र को कांटेदार बाड़ लगाकर संरक्षित किया जाना चाहिए। हिरनों की भूख मिटाने के लिए उनकी पसंदीदा घास और पीने के पानी का मुकम्मल इंतजाम होना चाहिए। शिकारियों और कुत्तों से इनकी सुरक्षा के लिए कर्मियों की तैनाती की मांग भी लंबे समय से उठ रही है।
हिरनों के लिए संरक्षण के लिए हमने पानी के गड्ढे बना रखे हैं। हिरनों की देखभाल के लिए वन विभाग की टीम लगातार निगरानी करती है। हिरनों के लिए संरक्षण केंद्र बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, जो वहां लंबित है। हिरनों की सुरक्षा व संरक्षा के लिए जितना बेहतर हमारे स्तर से हो सकता है, उतना हम कर रहे हैं।
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-डॉ. सीपी सिंह, प्रभागीय वनाधिकारी हाथरस
बारिश का जो पानी नाले में बहता है, उसे पीने से हिरनों को कई प्रकार की बीमारियां हो सकती हैं। चूंकि यह मनुष्यों के पास नहीं जा सकते। इसी वजह से यह परेशान रहते हैं और कमजोर होते चले जाते हैं और ज्यादा दौड़ नहीं पाते। इसकी वजह से यह आवारा कुत्तों का शिकार बन जाते हैं। इनके स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छ पानी की उपलब्धता होना जरूरी है।
-डॉ. भूपेंद्र जैन, पशु चिकित्साधिकारी
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