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जिसने दिखाई विकास की राह, जिम्मेदार उससे हुए बेपरवाह

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संडीला। औद्योगिक क्षेत्र में 21 सालों से बंद पड़ी कताई मिल में फिर से धागे बनने की उम्मीद को पंख नहीं लग सके हैं। पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल पर मिल को चलाने की घोषणा सिर्फ शब्दजाल में सिमट गई है।
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इसे लेकर स्थानीय लोग खासे मायूस हैं। 1970 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मिल का शिलान्यास किया था। यहां तैयार धागे की मांग एक जमाने में खूब थी। बेपरवाही के कीटों ने मिल के धागे को कुछ इस तरह कुतर डाला कि 2000 का दशक आते-आते यह बंद हो गई।
पिछले वर्ष प्रदेश सरकार द्वारा कताई मिलों के संचालन के लिए पीपीपी मॉडल अंतर्गत प्रदेश की कताई मिलों को शुरू करने की घोषणा की गई थी। जिसमें संडीला की यह मिल भी थी, लेकिन प्रक्रिया नहीं बढ़ सकी।
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बंद पड़ी मिल की अधिकांश मशीनें कबाड़ हो चुकी हैं। जनरेटर जंग खा चुके हैं। खिड़की-दरवाजे टूटने के साथ लोहे के जंगले भी गल गये हैं। पूरा एरिया जंगल की तरह हो गया है। यहां लगा बोर्ड भी जंग खा चुका है।
मिल की स्थापना के बाद यहां पर औद्योगिक क्षेत्र तो विकसित हो गया, लेकिन इस विकास में यह मिल कहीं खो गई है।
लगभग 10 वर्षों से बंद चल रही मिल से अराजक तत्वों ने मशीनों के पुर्जे खिड़की, दरवाजे व मशीन आदि चोरी कर बेच दिए। इसकी जानकारी जब शासन को हुई तो 11 वर्ष पहले यूपीएसटीसी ने प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी से यहां सुरक्षा व्यवस्था की।
मिल ने दिया क्षेत्र को विकास
मिल में करीब 6 हजार लोग काम करते थे। मिल बंद होने के बाद सभी वीआरएस (स्वैच्छिक रिटायरमेंट) दे दिया गया। अधिकांश कर्मचारियों को पीएफ तक नही मिल सका।
मिल के कर्मचारियों शिव सहाय, अर्जुन प्रसाद, रमेश चंद्र, शिव मोहन शर्मा आदि ने बताया मिल शुरू न होने से निराशा है। मिल की स्थापना के बाद क्षेत्र में तमाम कंपनियों की स्थापना हुई।
इनमें प्रमुख रूप से पेप्सिको, पारस दूध, ज्ञानधारा आईपीएल बियर फैक्ट्री, ईस्ट ब्रेड प्लाई पाइप, हल्दीराम नमकीन, पिस्टल निर्माण इकाई समेत छोटी-बड़ी लगभग 150 फैक्ट्रियां लगी हुई हैं। इलाके में एक पेंट की बड़ी फैक्टरी बन रही है ।
इस तरह से शुरू हुआ था मिल का सफर
1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संडीला के औद्योगिक क्षेत्र में कताई मील का शिलान्यास किया था। पांच वर्ष में मिल तैयार हो गयी थी। धागे का उत्पादन भी शुरू हो गया।
1989 के दशक में यहां के बने धागों की की आपूर्ति पूरे देश में की जाती थी। उत्तर प्रदेश टैक्सटाइल्स कारपोरेशन (यूपी एसटीसी) के आधीन आने वाली इस कताई मिल की देश में पहचान रही।
1990 में मिल संचालन को लेकर शुरू हुई लापरवाही ने कामकाज को पटरी से उतार दिया। 1998 में धागा उत्पादन पूरी तरह से ठप हो गया। 2001 में कताई मिल के कर्मचारियों को वीआरएस दे दिया गया।
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