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विश्व स्तर पर लिस्टेड सांडी दहर झील प्यासी

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फोटो-05- बदहाल सांडी की दहर झील। - फोटो : HARDOI
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हरदोई। विश्व स्तर पर पहचान बना चुकी सांडी दहर झील में पानी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए लाखों रुपये खर्च हो गए, लेकिन गर्मी के मौसम में झील सूखने का इलाज आज तक नहीं हो सका। जिला प्रशासन ने फिर नए प्रोजेक्ट के जरिये झील तक पानी लाने के प्रयास में है। इस प्रोजेक्ट के लिए शासन से पैसों की दरकार है।
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जिले की इकलौती और प्रदेश की चुनिंदा झीलों में शामिल सांडी दहर झील को पक्षी विहार के नाम से जाना जाता है। रामसर साइट में विश्व की 2409वीं वेटलैंडस के रूप में सांडी दहर झील को 26 दिसंबर 2019 को दर्ज किया गया था।
ईरान स्थित रामसर साइट एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि है। ईरान स्थित वेटलैंड्स इंटरनेशनल रामसर साइट ने निर्धारित मानकों का परीक्षण करने के बाद झील को सूचीबद्ध किया था। भारत में इस झील सहित करीब 50 स्थल इस सूची में दर्ज हैं।
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अंग्रेज अफसर आते थे सांडी दहर झील
सांडी रेल लाओ संघर्ष समिति के संस्थापक डॉ.पंकज मिश्रा बताते हैं कि उनके बाबा पंडित बसंत लाल त्रिवेदी बताते थे कि सांडी में रेल लाइन थी। यह रेल लाइन अंग्रेजी हुकूूमत में बनी थी।
इस रेल लाइन के जरिये अंग्रेज अफसर परिवार के साथ यहां आते थे। आशुतोष कहते हैं कि उनके बाबा जेपी कहते थे कि दहर झील प्रकृति का अनूठा उपहार है।
1980 के दशक में इसे विकसित करने की कार्ययोजना बनी और 1990 के दशक मेें यहां पर्यटक आवास, गेस्टहाउस आदि बनकर तैयार हो गए। गैर प्रदेशों से पर्यटक यहां आया करते थे।
2012 से कम होने लगा पानी
स्थानीय लोगों के अनुसार उन्होंने अपने पुरखों से सुना था कि सैकड़ों वर्ष पुरानी दहर झील में हमेशा पानी रहता था। हर वर्ष जाड़े के मौसम में लाखों विदेशी पक्षी यहां प्रवास करने आते थे।
स्थानीय लोगों के अनुसार अभी भी विदेशी पक्षी प्रवास करने आते हैं मगर बीते एक दशक से झील का पानी सूख जाता है, इसलिए प्रवासी पक्षियों की आवक कम हुई है।
प्रशासन ने पानी की व्यवस्था के लिए जो प्रयास किए वे नाकाफी साबित हुए है। 2012 से झील में अचानक पानी कम होना शुरू हो गया था। इससे पहले सैकड़ों बीघा की इस झील में पानी हमेशा रहता था।
यहां बड़े पैमाने पर कमल गट्टा होता था। बताते हैं कि भूगर्भ जल स्तर गिरावट के बाद झील का प्राकृतिक स्त्रोत किन कारणों से बंद हो गया। इससे झील में पानी की निर्भरता गर्रा नदी से ओवरफ्लो होकर आने वाला बाढ़ और बारिश का पानी ही रह गया।
पिछले सात वर्षों में इस तरह की गई व्यवस्था
पिछले सात वर्षों में दहर झील में पानी लाने के लिए पहले नलकूप लगाकर व्यवस्था की गई। नलकूप लगाने और उसके संचालन पर करीब दो करोड़ रुपये खर्च किया गया, लेकिन झील का पानी सूखने का मर्ज दूर न हो सका।
इसके बाद गर्रा नदी से झील तक पानी लिफ्ट कराकर लाने के लिए सवा चार करोड़ खर्च किए गए। इसके बाद भी पानी की उपलब्धता हर मौसम में नहीं हो सकी। गर्मी के दौरान झील सूख जाती है।
सिंचाई विभाग का कहना है कि रोस्टर के अनुसार नदी से एक जनवरी से 30 जून तक पानी नहीं लिया जा सकता है। अब इस झील में पानी की उपलब्धता के लिए नए सिरे से योजना बनाई जा रही है।
इसमें करीब चार करोड़ की धनराशि की दरकार है। सिंचाई विभाग की नजदीक की नहर से दहर झील को जोड़ने के लिए मानइर टाइप की कनेक्टिविटी देने के लिए कार्ययोजना शासन को भेजी गई है ।
वर्जन
यह सही है कि गर्मी के मौसम में झील का पानी सूख जाता है। नई योजना के तहत नहर से पानी लाने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी के सुझाव पर बनी कार्ययोजना शासन को भेजी गई है। करीब चार करोड़ की कार्ययोजना की स्वीकृति मिलने पर कार्य शुरू होंगे। - आशुतोष कुमार, क्षेत्रीय वन अधिकारी, सांडी
पुराने सिस्टम को पटरी पर लाने के साथ ही नहर से कनेक्टिविटी के लिए अपर मुख्य सचिव वन को कार्ययोजना भेजी गई है। करीब चार करोड़ के इस प्रोजेक्ट के साथ ही कुछ कार्य मनरेगा से वहां पर जल संचयन के लिए कराने की कार्ययोजना है। स्वीकृति मिलने के बाद कार्य शुरू हो जाएंगे। - अविनाश कुमार, डीएम, हरदोई
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