हरदोई। चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की मंदिरों और घरों में पूजा-अर्चना की गई। मां के भक्तों ने मंदिरों में मत्था टेक कर सुख-समृद्धि की कामना की।
आचार्य गण घरों में दुर्गा शप्तसती का पाठ कर रहे हैं। मंदिरों में सुबह से लेकर देर शाम तक भक्तों के आने जाने का सिलसिला रहने से पुजारी व्यस्त है।
हर कोई अपनी सामर्थ्य एवं श्रद्धानुसार पूजा पाठ कर रहा है। बड़ी संख्या में भक्त नवरात्र के पूरे उपवास रखे ह़ुए है। मंदिरों से लेकर घरों तक माता के लिए पंचमेवा, फल, मिष्ठान आदि से भोग लगाया जा रहा है।
शहर से लेकर गांवों तक उत्सव सा वातावरण बना हुआ है। आचार्य अशोक मिश्र, पुरोहित बालस्टर मिश्रा, माता अन्नपूर्णा मंदिर के महंत महामाया गुल्लू महाराज, आचार्य शिवम ने बताया कि नवरात्र रूपी महापर्व के दौरान लोगों द्वारा परंपरागत ढंग से नौ दिनों तक उपवास रखा जाता है।
तमाम भक्त सिर्फ जल और दुग्धाहार के सहारे उपवास करते हैं। मां की आराधना करने से कष्ट दूर हो जाते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। आचार्य गणों ने बताया कि शहर के कई मंदिरों में नवरात्र के तीसरे दिन सोमवार को मां के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा देवी की पूजा हुई।
मान्यता है कि जिसके घंटा में चंद्रमा स्थित है, वहीं देवी चंद्रघंटा के नाम से जगत में विख्यात हैं। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्रमा सुशोभित है, वही चंद्रघंटा देवी है।
माता चंद्रघंटा की आराधना करने से बड़ा से बड़ा भय दूर होता है। भक्तों पर असीम कृपा करने वाली मां चंद्रघंटा देवी की कृपा से दुख दूर होते हैं।
तीन मुख वाली मां संकटा पूरी करतीं कामना
शाहाबाद। नगर के प्राचीन संकटा देवी मंदिर की महिमा अपरंपार है। इन्हें संकट हरण माता के रूप में जाना जाता है। ऐसी किवंदती है कि मुगल काल में सिद्धनाथ बाबा की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर माता शेर पर सवार होकर प्रकट हुईं।
उन्होंने बाबा से वर मांगने को कहा, तो बाबा ने माता से महाकाली, महालक्ष्मी और सरस्वती के रूप में विराजमान होने का वरदान मांगा। तब से एक साथ तीन मुख वाली माता संकटा देवी मंदिर में विराजमान हैं।
मंदिर की मरम्मत के दौरान 1417 में की ईंट के मलबे से यह मूर्ति निकली थी। रहस्यमय है कि देवी मंदिर में किसी भी भक्त को अभी तक माता की प्रथम पूजा का सौभाग्य नहीं मिल सका है।
चाहे वह रात के किसी भी पहर में क्यों न आए। प्रथम पूजा का अधिकार केवल सिद्धनाथ बाबा को ही प्राप्त है। मंदिर की ख्याति से दूर दराज के तमाम भक्त अपने कष्टों के निवारण के लिए यहां आते हैं।
अपनी मनोकामना पूरी होने पर संकल्प पूरा करते हैं। चैत्र व क्वांर की नवरात्र में मंदिर में सुबह से रात तक भक्तों का आना जाना रहता है। श्रीमद्भागवत के माध्यम से धर्म की चर्चा होती रहती है।
ज्येष्ठ माह की अमावस्या से आषाढ़ की पूर्णिमा तक हर सोमवार व शुक्रवार को देवी मां के मेले का आयोजन किया जाता है। यहां पर मुंडन संस्कार पूरे साल होता रहता है।
प्राचीन देवी मंदिर में पुजारी का कार्य वर्षों से माली जाति के परिवार के पास है। देवी मंदिर से सटे मनोकामना पूरी करने वाले रघुनाथ मंदिर व हनुमान के मंदिर के प्रति भी लोगों की आस्था है।
भगवान ने ध्रुव को अटल पदवी देने का लिया निर्णय
बेहटागोकुल। कस्बे के प्राचीन दुर्गा मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा में व्यास ने ध्रुव और सती चरित्र का प्रसंग सुनाया। ध्रुव चरित्र में भगवान ने भक्त की तपस्या से प्रसन्न होकर अटल पदवी देने का वर्णन किया।
कमालपुर गांव में चल रही कथा में सोमवार को कथा वाचक पंडित उमाशंकर दुबे ने कहा कि भगवान शिव की अनुमति लिए बिना उमा अपने पिता दक्ष के यहां यज्ञ में पहुंच गईं।
यज्ञ में भगवान शिव को निमंत्रण नहीं देने से कुपित होकर सती ने यज्ञ कुंड में आहुति देकर शरीर त्याग दिया। इससे नाराज शिव के गणों ने राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया, इसलिए जहां सम्मान न मिले वहां कदापि नहीं जाना चाहिए।
ध्रुव प्रसंग में बताया कि सौतेली मां से अपमानित होकर बालक ध्रुव कठोर तपस्या के लिए जंगल को चल पड़े।
बारिश, आंधी-तूफान के बावजूद तपस्या से न डिगने पर भगवान प्रगट हुए और उन्हें अटल पदवी प्रदान की। ऋषभ देव ने कथा सुनाते हुए कहा कि वह अपने पुत्रों को गोविंद का भजन करने का उपदेश देकर तपस्या को वन चले गए।
भरत को हिरनी के बच्चे से अत्यंत मोह हो गया। नतीजे में उन्हें मृग योनि में जन्म लेना पड़ा। देशी माली, सुनील, प्रियंका देवी, बबलू गुप्ता, रामजी सिंह, चौहान, अंजू सिंह रहे।
फल की चिंता किए बिना कर्म करें
पिहानी। डर्रा बुख़ारपुर गांव स्थित रामघाट निपान किला आश्रम पर जारी श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन भारी भीड़ जुटी। व्यास राजेश्वर नंद गिरी ने कहा कि सुखदेव राजा परीक्षित को भागवत की कथा सुनाते हुए कहते हैं कि मनुष्य को कर्मों का फल जरूर मिलता है।
कर्म ही प्रधान है। जो जैसा करता है, उसे उसी के अनुसार फल भी भोगना पड़ता है। हमें परिणाम की चिंता किए बिना कर्म करते रहना चाहिए। उन्होंने समझाया कि आलसी बनकर घर पर नहीं बैठना चाहिए।
फल पर अपना अधिकार नहीं होता। प्रयत्न करने से फल प्राप्त होगा ही, ये निश्चित नहीं है। कर्म करना हमारा कर्तव्य है, सो कर्म करते रहना चाहिए। बाबा कमलेश गिरी, पुनीत शर्मा, सतीश बाबू, गोपाल दास भोला, बाबा सुखराम मुनि आदि रहे।
मृत्यु से भयभीत परीक्षित ने किया भगवान का ध्यान
हरदोई। पंचनद कटरी इलाके के अवस्थीपुरवा गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में व्यास संपत शास्त्री ने महाराज परीक्षित के श्राप को लेकर उपजे भय और भगवान के ध्यान प्रसंग का वर्णन किया।
बताया कि श्राप के भय से भयभीत महाराज परीक्षित को व्यास जी समझाते हैं कि हे राजन आपको पता हो चुका है कि सात दिन बाद मृत्यु आपका वरण करेगी। ऐसे में भय करने के स्थान पर भगवान का ध्यान करो।
कहा कि परमात्मा का अंश आत्मा है और आत्मा शरीर को त्याग कर फिर से परमात्मा के पास जाती है। जब जीव शरीर धारण करता है तो जीवन के कार्यकलापों में अपने मूल यानी परमात्मा को भूल जाता है।
यही भूल भय का कारण बनती है। भगवान को भूलने वाले को ही भय सताता है। जो भगवान को सदैव स्मरण रखते हैं, उनका हर तरह से कल्याण ही होता है। इस मौके पर संतोष अवस्थी, श्रीकांत अवस्थी, सर्वेश, अवधेश, रामानंद, सुनील आदि मौजूद थे।
चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया...
मल्लावां। माता मान देवी मंदिर में साईं बाबा के तेरहवें वार्षिकोत्सव में रविवार को पालकी, शोभायात्रा एवं भंडारा के बाद रात में जागरण हुआ। इसमें लखनऊ के कलाकारों द्वारा जगराता किया गया।
जागरण में मंदिर के संस्थापक महेश सिंह व मीनू सिंह अर्कवंशी ने पूजा-अर्चना की। संचालक कुमार सनी ने माता रानी के भजन चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है...।
कपिल बावरा आगरा ने प्यारा सजा है तेरा दरबार भवानी एवं मैया का चोला है रंग लाल है रंग लाल सुनाकर खूब तालियां बटोरी। गायिका मानसी गुप्ता मुरादाबाद द्वारा प्रस्तुत भजन चलो एक बार ले चलो मुझे माता रानी के दरबार ले चलो...सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया।
इसके अलावा गायक साजन लखनऊ, गायक शेखर कानपुर ने शिरडी वाले साईं बाबा आया है तेरे दर पर सवाली आदि कई भजनों से भक्ति का माहौल बनाया।
इस मौके पर रामकिशन, सत्यसील पांडे , महेश गुप्ता, विपिन सोनी, अनिल अर्कवंशी, दिलीप कुमार दौवा, रोहित, राम सिंह आदि रहे।