हरदोई। पुरुष और महिला अस्पतालों की दुर्दशा के बाद पशु अस्पताल भी अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को विवश हैं। जिले में कहने को तो 47 पशु अस्पताल हैं, लेकिन यहां पर स्टाफ की कमी और संसाधनों के अभाव के चलते लाखों पशुपालक निजी पशु डाक्टरों के भरोसे हैं।
1306 ग्राम पंचायतों के करीब 2000 राजस्व गांव और 19 विकासखंड समेत 13 नगरीय क्षेत्रों में करीब 17 लाख पालतू मवेशी हैं। इनमें सिर्फ गोवंशों एवं महिषवंशों की संख्या ही 12 लाख से अधिक है।
इन मवेशियों की सेहत खराब होने पर इलाज के लिए सरकारी व्यवस्था के नाम पर 47 पशु चिकित्सालय संचालित हैं।
पिछले एक दशक में जिले में पालतू मवेशियों की संख्या की बात करें, तो इनमें करीब दो लाख की बढ़त हुई है, लेकिन पशु चिकित्सालयों की संख्या बढ़ाने एवं डाक्टरों की उपलब्धता को लेकर कोई विशेष कार्य नहीं हुआ
जिससे पशुपालकों के लिए पशुओं की स्वास्थ्य रक्षा को लेकर उलझन सी बनी रहती है। जिले की आबादी करीब 40 लाख है और परिवारों की बात की जाए तो करीब 12 लाख परिवार हैं। इन परिवारों में करीब आठ लाख के तो राशन कार्ड बने हुए हैं।
इस तरह से औसतन हर परिवार के हिस्से में एक महिषवंश या गोवंश आते हैं। यह अलग बात है कि आंकड़ों के हिसाब से यह अनुमान ठीक है, मगर अभी भी पशुपालन को लेकर 50 फीसदी परिवार अपना रुझान नहीं बना पाए हैं।
ऐसे में जमीनी हकीकत यह है कि कोई परिवार चार-चार पशु पाले हुए हैं, तो कोई एक भी नहीं पाले हुए है। इसके पीछे भी अहम कारण कहीं न कहीं पशु चिकित्सा सुविधा का विस्तार न हो पाना है।
विभागीय लोग भी मानते हैं कि जिले में पशु चिकित्सालयों की संख्या कम होने के कारण पशुपालकों को पशु के बीमार होने पर काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में समुचित इलाज न मिल पाने के कारण पशुओं को तमाम तकलीफों का सामना करना पड़ता है।
हकीकत यह है कि कहीं डाक्टरों की उपलब्धता नहीं हो पाती, तो कहीं चिकित्सा उपकरण, जिससे पशुपालकों के सामने अस्पतालों तक लंबी दूरी तय करने के लिए पहुंच के साधनों की समस्या के साथ पशु को रोकने एवं थामे रखने की भी बड़ी समस्या होती है।
टीकाकरण के समय आती है पशुओं की याद
नियमानुसार पशु चिकित्सालयों में तैनात डाक्टरों के नियमित रूप से चिकित्सालयों में बैठने के साथ ही स्टाफ के साथ आसपास के गांवों का भ्रमण करना चाहिए।
खासतौर से जब मौसमी बीमारियों के फैलने के खतरा रहता है, तब डाक्टरों का भ्रमण होना चाहिए, मगर हालत यह है कि डाक्टर अस्पतालों में मिलते ही नहीं और अधिकांश स्थानों पर सहायक स्टाफ ही कार्य करता है।
यह अलग बात है कि जब पशुओं के खुरपका एवं मुंहपका की बीमारी के मौसम बरसाती मौसम में टीकाकरण का अभियान चलता है, तो विभाग के जिम्मेदारों को पशुओं के स्वास्थ्य की याद आती है।
तो ऐसे होता है इलाज
जिले में संचालित पशु चिकित्सालयों में यदि जिला मुख्यालय एवं मुख्य स्थानों पर स्थित चिकित्सालयों को छोड़ दिया जाए, तो दूर दराज क्षेत्रों में स्थित चिकित्सालयों के भवनों से लेकर उपकरण आदि संसाधनों का हाल खराब हैं।
ऐसे में पशुपालकों को पशु की बीमारी का लक्षण बताकर इलाज की दवाएं लिख जाती है, जिसमें इंजेक्शन स्वयं लगाता है। इस तरह से एक ज्यादा मवेशी रखने वाले पशुपालक स्वयं डाक्टरी करने को विवश रहते हैं या फिर सुविधानुसार अन्य किसी तरह से मदद लेते हैं।
सबसे ज्यादा परेशानी दुधारू पशुओं को
मवेशियों की सेहत को लेकर पशु पालक सबसे ज्यादा चिंता दुधारू पशुओं की दूध देने की अवधि में करते हैैं। दरअसल दूध बेचकर आमदनी बढ़ाने वाले किसानों के लिए दुधारू पशुओं का पालन आय का प्रमुख जरिया बन चुके हैं।
ऐसे में महिषवंश एवं गोवंश में ज्यादा दूध देने वाली नस्लों की ओर किसानों का रुझान बढ़ा है और गैर प्रदेशों से वह मवेशी लाते हैं।
गैर प्रदेशों से आने वाले दुधारू मवेशियों को शुरुआत के दिनों में बदलने वाले दाना पानी एवं आबोहवा से तमाम दिक्कतें होती हैं, जिससे तमाम मवेशी बीमार हो जाते हैं। सही इलाज न मिलने पर मवेशी दम तोड़ देते हैं।
बोले पशुपालक
शेखपुर क्षेत्र के निवासी गोविंद ने बताया कि चार माह पहले एक दुधारू मवेशी लाए थे। काफी बीमार पड़ने के बाद उसके इलाज के खूब दौड़भाग की, मगर घर तक सरकारी डाक्टर एवं स्टाफ आ नहीं पाए और दवाखानों से पूछ पूछकर इलाज करते रहे।
सात हजार रुपये इलाज में खर्च हो गए। इसी तरह से हरपालपुुर क्षेत्र के एक गांव में एक पशुपालक ने प्राइवेट इलाज में हो रहे हजारों के खर्च से परेशान होकर दुधारू मवेशी को किसी अन्य को दे दिया।
ऐसे कई मामले होते रहते हैं, जिसमें पशुपालक परेशान होकर या तो मवेशी को बेच देते है या फिर खुला छोड़ देते हैं।
जिले में संचालित पशु अस्पताल
संडीला, शाहाबाद, हरदोई शहर, बावन, सवायजपुर, पाली, पिहानी, सदरपुर, मल्लावां, बम्हनाखेड़ा, रैंसो, सकतपुर, मोहम्मदपुर, सुरसा, माधौगंज, लालपालपुर, टोडरपुर, कोथावां
सांडी, अयारी, टड़ियावां, गौसगंज, हरपालपुुर, बेहंदर, मलेहरा, राधौपुर, मेंहदीखेड़ा, कुरसठ, समुखा, अहसी आजमपुर, महीठा, छतिहारामपुर, बड़ागांव, भरखनी, परसोला, बिलग्राम, हरियावां, बिहंगांव, श्रीमऊ, भरावन, कछौना, कैखाई, अहिरोरी, गोपामऊ, बेनीगंज, पचदेवरा, छिबरामऊ।
कमियों को कराएंगे दुरुस्त
सेवाओं को लेकर जो कमियां है, उन्हें दुरुस्त कराया जाएगा। अधिकांश भवनों को दुरुस्त कराया जा चुका है। कुछ बचें हैं, उनके लिए डिमांड लेेटर भेजा जा चुका है। यदि डाक्टर और स्टाफ नहीं मिलता है, तो जानकारी दें कार्यवाही होगी।
कोरोना के समय सेवाएं प्रभावित रही थीं, मगर सेवाएं पटरी पर लौट चुकी हैं। पशुपालक किसी प्रकार की दिक्कत होने पर सीधे उनके कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।
- डॉ. जेएन पांडेय, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी