- 31 करोड़ खर्च के बावजूद आत्मनिर्भर नहीं बन सके गो-आश्रय स्थल
- गोबर खाद, गोमूत्र व दुग्ध उत्पादन से आय का कोई रिकॉर्ड नहीं
- 163 गोशालाओं के विलय के बाद भी खेतों-सड़कों पर छुट्टा गोवंश
फोटो 07 एचएएमपी 01- धौहल बुजुर्ग में लाखों रुपये खर्च से बना गो-आश्रय स्थल विलय के बाद वीरान पड़ा। संवाद
फोटो 07 एचएएमपी 02- मूंगफली की फसल में चरते छुट्टा गोवंश। संवाद
फोटो 07 एचएएमपी 03- धौहल बुजुर्ग में सड़क हादसे में घायल गोवंश का प्राथमिक उपचार करते ग्रामीण। संवाद
फोटो 07 एचएएमपी 04- राठ हमीरपुर मार्ग ललपुरा उजनेड़ी के बीच सड़क पर खड़े अन्ना मवेशी। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
हमीरपुर। धरती पर गाय ही ऐसा जानवर जिसका दूध से लेकर गोबर तक हर चीज उपयोगी है। इसकी खेती-किसानी में काफी डिमांड रहती है। छोटे-छोटे स्तर पर दो-चार गाएं रखकर लोग खूब कमाई भी कर रहे हैं। लेकिन निराश्रित गोवंशों के संरक्षण और ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से सरकार ने गोशालाओं पर करोड़ों खर्च कर गोशालों का निर्माण करवाया। लेकिन इनसे आज तक फूटी काैड़ी की आमदनी नहीं हुई।
जनपद में वर्ष 2025-26 में गोशालाओं के संचालन पर 31.05 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि प्रत्येक गोवंश पर प्रतिदिन 50 रुपये (35 रुपये चारा-भूसा एवं 15 रुपये हरा चारा) स्वीकृत है। इसके अलावा मनरेगा, राज्य वित्त एवं अन्य मदों से टिन शेड, भूसा घर, चरही, हैंडपंप, तारबाड़, सुरक्षा खाई और अन्य निर्माण कार्यों पर भी करोड़ों रुपये खर्च किए गए।
संवाद न्यूज एजेंसी ने जब इसकी पड़ताल की तो सामने आया कि गोशालाओं से गोबर खाद, गोमूत्र, वर्मी कम्पोस्ट अथवा दुग्ध उत्पादन से ग्राम पंचायतों को हुई आय का विभाग के पास कोई रिकॉर्ड ही नहीं है। शासन ने जिले की 308 गोशालाओं में से 163 का विलय (डी-एक्टिवेट) कर दिया है। वर्तमान में 145 सक्रिय गोशालाओं में 26,279 गोवंश संरक्षित होने का दावा किया गया है, लेकिन सरीला, मौदहा और सुमेरपुर विकासखंडों में खेतों में छुट्टा गोवंश फसलें चरते और रात में सड़कों पर झुंड के झुंड बैठे मिले। अब सवाल यह कि जिनके लिए करोड़ों खर्च कर गोशालाएं बनाई गईं वे सड़क पर हैं तो उन गोशालाओं में काैन है।
समाजसेवी अरविंद तिवारी का कहना है कि यदि गोवंशों को पर्याप्त चारा-दाना और बेहतर देखभाल मिले तो गोबर खाद और अन्य उत्पादों से पंचायतों की आय बढ़ सकती है। उनका आरोप है कि कई स्थानों पर व्यवस्थाएं अपेक्षित स्तर की नहीं हैं, जिससे उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा।
आत्मनिर्भर बनाने का उद्देश्य अधूरा
सरकार का उद्देश्य केवल निराश्रित गोवंशों को आश्रय देना ही नहीं, बल्कि गोशालाओं के माध्यम से ग्राम पंचायतों की आय बढ़ाना भी था। गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, गोमूत्र और दुग्ध उत्पादन जैसे स्रोतों से आय बढ़ाकर गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की परिकल्पना की गई थी, लेकिन संबंधित विभाग ऐसा कोई समेकित आंकड़ा उपलब्ध नहीं करा सका कि जिले की गोशालाओं से इन मदों में कितनी आय हुई और ग्राम पंचायतों को कितना लाभ मिला।
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धौहल बुजुर्ग : 50 लाख की परिसंपत्तियां बेकार
सरीला विकासखंड के धौहल बुजुर्ग गांव में मनरेगा से सुरक्षा खाई और तालाब, जबकि राज्य वित्त से टिन शेड, भूसा घर, चरही, हैंडपंप और तारबाड़ सहित अन्य निर्माण कराए गए। ग्रामीणों के अनुसार विभिन्न मदों से 50 से 60 लाख रुपये से अधिक खर्च हुए। अब गोशाला के विलय के बाद पूरा परिसर खाली पड़ा है। टिन शेड जर्जर हो रहे हैं, चरही टूट चुकी है और सरकारी परिसंपत्तियां उपेक्षा का शिकार हैं। समाजसेवी रणधीर यादव का कहना है कि जिन परिसंपत्तियों पर लाखों रुपये खर्च हुए, उनके संरक्षण और उपयोग की कोई स्पष्ट योजना दिखाई नहीं देती।
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गोवंशों की वास्तविक संख्या पर भी उठे सवाल
बृजेन्द्र कुमार का कहना है कि धौहल बुजुर्ग गोशाला में पहले 140 से 150 गोवंश दर्ज होते थे। वहीं कटेहरी ग्राम प्रधान श्यामबाबू का कहना है कि धौहल से अब तक 90 गोवंश उनकी गोशाला में लाए जा चुके हैं तथा 20 से 30 गोवंश अभी भी गांव में खुले घूम रहे हैं। ऐसे में गोवंशों की वास्तविक संख्या को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। विभाग ने कहा है कि विस्तृत रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाएगा।
फसलें उजड़ रहीं, सड़कें भी असुरक्षित
धौहल बुजुर्ग, बांधुर खुर्द, मौदहा और सुमेरपुर क्षेत्र में किसानों ने तिल, उड़द, मूंगफली, अरहर, ज्वार, बाजरा और धान की फसलों को छुट्टा गोवंश से नुकसान पहुंचने की शिकायत की। वहीं सरीला-बिवार मार्ग, सुमेरपुर-बांदा राज्य मार्ग आदि पर रात में सड़क पर बैठे गोवंश मिले, जिससे दुर्घटना का खतरा बना रहता है। हाल के दिनों में सुमेरपुर, मौदहा, शीतलपुर, राठ और धौहल क्षेत्र में आवारा गोवंशों से जुड़े कई हादसे सामने आए हैं। इनमें लोगों के साथ-साथ गोवंशों की भी मौत हुई है।
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रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत में अंतर
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डाॅ. भूपेंद्र यादव ने बताया कि विभाग के कंप्यूटरीकृत रिकॉर्ड में पिछले एक वर्ष के दौरान गोशालाओं में गोवंश की मृत्यु का कोई विवरण नहीं है। यह रिकॉर्ड नगर पालिका या ग्राम पंचायत के पास हो सकता है। वहीं दूसरी ओर हाल के दिनों में सड़क दुर्घटनाओं में कई गोवंशों की मौत की घटनाएं सामने आई हैं। इससे विभागीय रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति के बीच अंतर को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
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वर्जन
शासन के निर्देशानुसार प्रति गोशाला न्यूनतम 100 गोवंश रखने के मानक के आधार पर विलय किया गया है। खाली परिसरों का भविष्य में अन्य उपयोग किया जाएगा। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी कार्यालय के अनुसार विभाग की जिम्मेदारी टैगिंग, टीकाकरण, बधियाकरण और उपचार की है, जबकि गोशालाओं के संचालन एवं रखरखाव की जिम्मेदारी संबंधित ग्राम पंचायत और विकास विभाग की होती है। -अरुण कुमार, मुख्य विकास अधिकारी
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एक नजर
कुल गोशालाएं : 308
सक्रिय गोशालाएं : 145
विलय (डी-एक्टिवेट) : 163
संरक्षित गोवंश : 26,279
प्रति गोवंश प्रतिदिन मद : ₹50
वर्ष 2025-26 में संचालन व्यय : ₹31.05 करोड़
वर्ष 2026-27 में अब तक व्यय : ₹2.46 करोड़
फोटो 07 एचएएमपी 01- धौहल बुजुर्ग में लाखों रुपये खर्च से बना गो-आश्रय स्थल विलय के बाद वीरान पड- फोटो : दक्षिण पुलिस की गिरफ्त में चरस के साथ पिता-पुत्र। स्त्रोत: विभाग
फोटो 07 एचएएमपी 01- धौहल बुजुर्ग में लाखों रुपये खर्च से बना गो-आश्रय स्थल विलय के बाद वीरान पड- फोटो : दक्षिण पुलिस की गिरफ्त में चरस के साथ पिता-पुत्र। स्त्रोत: विभाग
फोटो 07 एचएएमपी 01- धौहल बुजुर्ग में लाखों रुपये खर्च से बना गो-आश्रय स्थल विलय के बाद वीरान पड- फोटो : दक्षिण पुलिस की गिरफ्त में चरस के साथ पिता-पुत्र। स्त्रोत: विभाग