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कांग्रेस के साथ विधायकी भी छोड़ कायम की मिसाल

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फोटो- 1- गोंडा में बाबू ईश्वर शरण की प्रतिमा। - संवाद - फोटो : GONDA
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गोंडा। वर्तमान समय में राजनेताओं का पार्टी बदलना आम बात हो गयी है। सालों तक किसी पार्टी से जुड़े रहने के बावजूद नेता मनमाफिक सुविधा व पद पाने की चाहत में जब चाहे पाला बदल लेते हैं। ‘आया राम, गया राम‘ की तर्ज पर कार्य करने वाले नेताओं के लिए नैतिकता कोई मायने नहीं रखती है। लेकिन पहले के दौर में ऐसा नहीं होता था और राजनेता जब दल बदलते थे तो उस पार्टी से जुड़े होने के कारण मिले पद व फायदे भी किनार कस लेते थे।
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आजादी से पहले जिले के कद्दावर कांग्रेसी नेता और तात्कालिक विधायक बाबू ईश्वर शरण ने जब कांग्रेस से इस्तीफा देकर पार्टी छोड़ी तो नैतिकता का हवाला देते हुए विधायक पद से भी त्यागपत्र दे दिया था। उनकी राजनैतिक निष्ठा और नैतिकता पूर्ण आचरण आज भी जनप्रतिनिधियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बना है। जिले के प्रख्यात स्वाधीनता सेनानी बाबू ईश्वर शरण 18 वर्ष की आयु में ही स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में कूद पडे़ थे। एटा के राजकीय स्कूल में पढ़ाई के दौरान वर्ष 1919 में जलियां वाला बाग के नरसंहार का उनके बाल मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। 1920 में महात्मा गांधी के आह्वान पर वह पढ़ाई छोड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पडे़। पार्टी को मजबूत बनाने के लिए 1921 में उन्होंने कांग्रेस स्वयंसेवी कोर का गठन किया।
1925 में कानपुर कांग्रेस में ईश्वर शरण 100 स्वयं सेवकों के साथ शामिल हुए। कमेटी ने इन्हें विष्णु शरण दुबलिश के ऊपर चलने वाले काकोरी कांड की गवाही तोड़ने व मुकदमे की पैरवी के लिए भेजा था। 1936 में कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में हुआ, जिसमें जिले का नेतृत्व ईश्वर शरण सहित तीन लोगों ने किया। 1936 में ही संयुक्त प्रांत आगरा अवध की प्रांतीय असेंबली का चुनाव हुआ, इसमें ईश्वर शरण कांग्रेस के उम्मीदवार घोषित किए गए। इस चुनाव में उन्होंने तरबगंज क्षेत्र से प्रत्याशी रहे जिले के प्रसिद्ध वकील और कांग्रेस के बागी बिंदेश्वरी प्रसाद व नवाबगंज चीनी मिल के प्रबंधक कृष्णा देव को भारी मतों से हराया। बाद में वर्ष 1938 में ही कांग्रेस की कार्यसमिति के कहने पर उन्होंने सदस्यता से त्यागपत्र भी दे दिया।
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पंडित नेहरू मानते थे अनुज, इंदिरा कहती थी चाचा
अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित परिवार कमेटी के अध्यक्ष धर्मवीर आर्य बताते हैं कि तब कांग्रेस के मुखिया व पीएम नेहरू बाबू ईश्वर शरण को अनुज के रुप में मानते थे। बेटी इंदिरा गांधी भी उन्हें चाचा कहकर संबोधित करती थी। यही कारण था कि 1946 में जब असेंबली का चुनाव आया तो बाबू ईश्वर शरण को तरबगंज से कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया गया और वे इस बार निर्विरोध विधायक बन गए। देश की आजादी के बाद 1948 में आचार्य नरेन्द्र देव के नेतृत्व में जब कांग्रेस से सोशलिस्ट पार्टी अलग हुई तो उनके साथ बाबू ईश्वर शरण ने भी कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्टों का साथ दिया। तब नैतिकता के आधार पर कांग्रेस से अलग हुए सभी सोशलिस्ट विधायकों ने ईश्वर शरण की अगुवाई में विधान सभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया।
पंत से मिलने के बाद फिर बने कांग्रेसी
उप चुनाव में कांग्रेस के चंद्रभान शरण सिंह विजयी हुए। हालांकि देश को आजादी मिलने के बाद साल 1953 में पं. गोविंद बल्लभ पंत की प्रेरणा से बाबू ईश्वर शरण पुन: कांग्रेस में आ गए। 1957 में जब उन्हें फिर कांग्रेस ने मौका दिया और इसी तरबगंज से पार्टी का प्रत्याशी बनाया तो उन्होंने पार्टी के ही कार्यकर्ता शीतला प्रसाद सिंह के पक्ष में सीट छोड़ दी और अथक प्रयास कर उन्हें चुनाव में जिताया। इसके बाद कांग्रेस के सिम्बल पर ही वह 1962 व 1967 में लगातार दो बार गोंडा विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। 26 अगस्त 1991 को यह महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दुनिया छोड़कर पंचतत्व में विलीन हो गया।
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