जी हां, वह जांबाज जिसने जीप पर बैठकर पाकिस्तान के एक-दो नहीं सात-आठ पैटन टैंकों को बर्बाद कर दिया। अब्दुल हमीद की वीरता की इसलिए भी मिसाल दी जाती है, क्योंकि उस वक्त पैटन टैंकों को अजेय माना जाता था। हमीद ने मैदान ए जंग में पाकिस्तानी पैटन टैंकों की कब्रगाह बना दी। युद्धक्षेत्र में ही 10 सितंबर, 1965 को अब्दुल हमीद शहीद हुए, लेकिन तब तक वह अप्रतिम शौर्य की अविस्मरणीय दास्तां लिख चुके थे।
शहीद वीर अब्दुल हमीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते थानाध्यक्ष
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शहीद अब्दुल हमीद के बेटे जैनुल हसन ने कहा कि पिता के शहादत की खबर 19 सितंबर 1965 को एक अखबार में प्रकाशित खबर से पता चली थी। मेरी आंखों में आंसू देखकर मां रसूलन समझ गई और फफक कर रो पड़ी थीं। लेकिन पिता शहीद वीर अब्दुल हमीद की शहादत पर गांव-घर ही नहीं पूरे देश को फख्र है।
थानाध्यक्ष ने कहा कि वीर योद्धा शहीद वीर अब्दुल हमीद की वीर गाथा इतिहास के पन्ने में पढ़ते रहे। आज उनके जन्मभूमि पर आकर हम धन्य हो गए। शहीद हमीद ने 1965 के युद्ध का पासा ही पलट दिया था। उन्होंने अजेय पैटर्न टैंक को बर्बाद कर पाकिस्तानी फौज को पीछे भागने को मजबूर कर दिया था।