जिले के 2339 स्थानों पर बृहस्पतिवार को मुुहूर्त के अनुसार होलिका दहन हुआ। दहन के बाद लोगों ने होलिका की परिक्रमा की। इसके बाद लोगों मस्ती में झूमते दिखाई पड़े। अधिकांश लोग रंगों से सराबोर नजर आए। कई युवा बाइकों पर होली की टोपी लगाकर घूमते दिखाई दिए।
रंगों के पर्व पर होली पर 18 मार्च को शहर सहित जिले के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर कुल 2339 होलिका दहन मुहूर्त के अनुसार रात करीब 12.57 बजे किया गया। ब्राह्मणों द्वारा पूजन-अर्चन के बीच होलिका जलाई गई। पंडित मुनींद्र उपाध्याय ने बताया कि लकड़ी और कंडों की होली के साथ घास लगाकर होलिका खड़ी करके उसका पूजन करने से पहले हाथ में असद, फूल, सुपारी, पैसा लेकर पूजन कर जल के साथ होलिका के पास छोड़ दें और अक्षत, चंदन, रोली, हल्दी, गुलाल, फूल तथा गूलरी की माला पहनाया जाता है। इसके बाद होलिका की तीन परिक्रमा करते हुए नारियल का गोला, गेहूं की बाली तथा चना को भूंज कर इसका प्रसाद वितरित किया जाता है। बताया कि प्रह्लाद और होलिका का प्रसंग तो लगभग सभी लोग जानते हैं। माना जाता है कि होली पर्व का प्रारंभ प्रह्लाद और होलिका से जुड़ा है। विष्णु पुराण के अनुसार होलिका एक राक्षिसा थी, जिसे भगवान से वरदान प्राप्त था कि वह आग में
नहीं जलेगी। होलिका का भाई हिरण्य कश्यप जिसका पुत्र प्रह्लाद था, जो की भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, जो कि उनके पिता हिरण्य कश्यप को कतई पसंद नहीं था। इसी द्वेष के कारण हिरण्य कश्यप ने अपनी बहन होलिका से उनको जलाकर मारने की युक्ति बनाई। लेकिन जब होलिका प्रह्लाद को लेकर आग में बैठी तो होलिका का वरदान निष्फल सिद्ध हुआ और वह स्वयं उस आग में जलकर मर गई। तभी से लोगों ने इस बुराई की अच्छाई के जीत को होलिका दहन के त्योहार के रूप में मनाना शुरू कर दिया।