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परिषदीय स्कूलों में बढ़े 17 हजार छात्र

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परिषदीय स्कूलों में बढ़े 17 हजार छात्र
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संवाद न्यूज एजेंसी
फिरोजाबाद। कोरोना संक्रमण के दो वर्ष में अभिभावकों की आर्थिक तंगी से परेशान रहे। नजीजतन आर्थिक चोट से बचने के लिए उन्होंने अपने लाड़लों का परिषदीय स्कूलों में नामांकन कराया। यहां शिक्षा और सर्टिफिकेट की गारंटी भी है। कोरोना संक्रमण काल में परिषदीय विद्यालयों में 17 हजार से अधिक छात्र-छात्राओं के नामांकन हुए।
बीएसए अंजली अग्रवाल की मानें तो शैक्षिक सत्र 2019-20 में परिषदीय प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में एक से आठ तक की कक्षाओं में 1,66,857 छात्र-छात्राओं का नामांकन हुआ था। इसके बाद कोरोना संक्रमण दौर शुरू होने पर भी परिषदीय स्कूलों में बच्चों के नामांकन में वृद्धि हुई। शैक्षिक सत्र 2020-21 में 169665 छात्र-छात्राओं का नामांकन हुआ, जबकि 2021-22 के शैक्षिक सत्र में 184,638 ने परिषदीय स्कूलों में प्रवेश लिया।
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बीएसए ने बताया कि कोरोना काल के बाद छात्र संख्या बढ़ गई है। निजी स्कूलों से बच्चे परिषदीय स्कूलों में आए हैं। कायाकल्प के तहत विद्यालयों में बेहतर सुविधाएं हैं। जिले के सभी परिषदीय प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में बेहतर शैक्षिक सुविधा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। परिषदीय स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण एवं बच्चों को मानक के अनुरूप शिक्षा उपलब्ध कराया जा रहा है।
शिक्षक बोले,
2020 में कक्षा एक में कुल नौ एडमिशन हुए थे। 2021 में 25 एडमिशन हुए। दो साल पहले स्कूल में करीब 68 बच्चे पंजीकृत थे। इस बार 102 बच्चे हो गए हैं। प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई हुई नहीं थी और फीस मांगी जा रही थी। ऐसे में अभिभावकों ने परिषदीय स्कूलों में एडमिशन करा दिया। अब अभिभावक परिषद स्कूल की पढ़ाई से खुश हैं।
- शीबा हासिम, अध्यापक, प्राइमरी कोटला कन्या
पॉश कॉलोनी में विद्यालय होने के कारण वर्ष 2020 में छात्र संख्या 38 थी। अब छात्र संख्या में बढ़ोत्तरी हो गई है। कई बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे थे, वह अब परिषदीय विद्यालय में आ गए हैं। मुख्य वजह सामने आई कि अभिभावकों के पास निजी स्कूलों में फीस भरने के लिए रुपया नहीं था। सरकारी स्कूल में सुविधाएं भी बढ़ी हैं तो अभिभावक परिषदीय स्कूल पर भरोसा जता रहे हैं।
- अनिल कुमार, शिक्षक, प्राइमरी स्कूल आर्यनगर
- कोरोना काल में प्राइवेट स्कूलों पर असर पड़ा है। ऑनलाइन पढ़ाई हुई, मगर फीस अधिकांश अभिभावकों ने जमा नहीं की। इससे आर्थिक नुकसान भी हुआ। ऐसे में विद्यार्थी सरकारी स्कूलों की तरफ रुख कर गए। निजी स्कूलों की छात्र संख्या कम हुई है। निजी विद्यालयों में सरकार से कोई सहयोग नहीं मिला तो मजबूरन शिक्षकों की छंटनी करनी पड़ी।
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- दिनेश शर्मा, प्रधानाचार्य
एमजीएम स्कूल, ढ़ोलपुरा
- 20 फीसदी अभिभावकों ने ही स्कूल की फीस दी। जब स्कूल खुले तो अंग्रेजी माध्यम से बड़ी संख्या में यूपी बोर्ड के सरकारी स्कूलों में अभिभावकों ने अपने बच्चों का एडमिशन करा दिया। यहां तक कि मिशनरी स्कूलों में भी छात्र संख्या पर असर पड़ा है। कई छोटे विद्यालय ऐसे हैं, जो पूरी तरह खत्म हो गए। वहीं स्कूलों पर खर्चा पूरा रहा। नए शैक्षणिक सत्र में स्कूल का संचालन करना चुनौती है।
- मयंक भटनागर, जिलाध्यक्ष
प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन
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