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श्री सद्गुरु आश्रम में विधुर ने विधवा को बनाया जीवनसाथी

Fri, 22 Apr 2016 12:49 AM IST
ब्यूरो अमर उजाला, फतेहपुर
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एक-दूसरे को दयमाल पहनाते दूल्हा-दुल्हन - फोटो : अमर उजाला
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मलवां विकास खंड के दूधीकगार श्रीसद्गुरु आश्रम में गुुरुवार को एक विधुर ने विधवा के साथ शादी रचाई। बाजे-गाजे और आतिशबाजी के बीच निकली बारात को देखने के लिए काफी संख्या में लोग जुटे।
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मलवां विकास खंड के गांव गोगौली निवासी 52 वर्षीय विधुर बीरेंद्र सिंह गौर की पत्नी की मृत्यु एक दशक पहले हो गई थी। जिससे पैदा हुई पुत्री सुलेखा की शादी हो चुकी है। बेटा राजन बचपन से ही दृष्टिहीन है। उधर, गांव पहरवापुर निवासी राजबहादुर सिंह की 48 वर्षीय विधवा पुत्री मिथलेश सिंह के पति का देहांत पांच साल पहले हो गया था।

16 वर्षीय बेटी जानकी का भरण-पोषण व शिक्षा उसके ननिहाल में हो रही है। इन दोनों की शादी का प्रस्ताव समाजसेवी अमित शुक्ला ने रखकर संबंध तय करा दिया। गुरुवार को श्रीसद्गुरु आश्रम दूधी कगार में सैकड़ों बारातियों जनातियों की मौजूदगी में हिंदू रीति रिवाज से पं. आचार्य कामता प्रसाद शुक्ल ने विवाह संपन्न कराया। व्यवस्था दयाराम पांडेय, योगेंद्र, पप्पू भदौरिया, गोरे सिंह गौर, बीनू मिश्रा, अनुराग बाजपेई, कल्लू चौहान ने संभाली।
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शहर के प्रमुख व्यवसायी हरिओम रस्तोगी का कहना है कि समाज में हर महिला पुरुष को अपनी तरह से जीवन जीने का हक है। खासतौर पर महिला के लिए अकेले जीवन काटना कठिन होता है। ऐसी हालत में विधुर और विधवा ने शादी रचाकर समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने में अहम भूमिका निभाई है।

शिक्षाविद सतीश द्विवेदी कहते हैं कि समाज को विधवा विवाह को आगे बढ़ाने के लिए खुलकर आगे आने की जरूरत है, जिससे विधवा विवाह को बढ़ावा मिल सके।

दूधीकगार विद्यालय के प्रिंसिपल स्वयंवर सिंह एकाकी जीवन जी रहे विधुर व विधवा की शादी को जायज मानते हैं। इनका कहना है कि दोनों अधेड़ उम्र के हैं, इस वजह से समाज और उम्र दोनों के लिहाज से अच्छे-खराब की समझ रखते हैं। यदि दोनों राजी हैं और शादी कर एक साथ रहना चाहते हैं तो हर्ज क्या है। विधुर होना या विधवा होना अभिशाप नहीं है। उन्हें भी हंसी-खुशी जीवन जीने का हक है।

चौडगरा में होटल मालिक अमित शुक्ला की देखरेख में यह शादी हुई। अमित का कहना है कि विधुर शख्स उनके गांव का ही है। उसे खाने-बनाने की दिक्कत थी। एक बेटा नेत्रहीन है। ऐसे में सोचा कि यदि इसकी शादी हो जाए तो कुछ अच्छा हो जाए। यही सोच कर तलाश शुरू की तो विधवा महिला मिल गई।

उसे भी उम्र के इस पड़ाव में सहारा चाहिए था। बेटी ननिहाल में रह रही है और उसकी शादी के लिए भी वह चिंतित थी। बात करने पर भविष्य के मद्देनजर वह राजी हो गई। ऐसे में दोनों की शादी करा दी।

आचार्य दुर्गादत्त शास्त्री विधवा विवाह से पूरी तरह सहमत हैं। उनका कहना है विधुर और विधवा गंधर्व रीति से शादी रचा सकते हैं। इस रीति से होने वाले विवाह में किसी धार्मिक स्थल पर एक दूसरे को जयमाल पहनाकर महिला पुरुष जीवन साथी बना सकते हैं। विधवा और विधुर को  ब्राम्ह विवाह (सात फेरे लेना) धर्मग्रंथों में अनुचित माना गया है। अगर महिला अविवाहित है और पुरुष विधुर है, तो ऐसी दशा में सात फेरे लेकर ब्राम्ह विवाह किया जा सकता है।
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