जाहरवीर गोगा महाराज के निशान रविवार को पूरी श्रद्धा और आन बान शान के साथ
निकाले गए। फतेहगढ़ कोतवाली से निशान यात्रा दोपहर बाद शुरू हुई। सीएमओ
कार्यालय के पास जाहरवीर गोगा मंदिर में भगतों ने निशानों की पूजा की। इस
दौरान मेन रोड को बंद कर दिया गया था। सड़क के किनारे लगे मेले में लोगों
ने खरीददारी की। आयोजन के
दौरान पुलिस बल मुस्तैद रहा। यात्रा में कई जिलों
के श्रद्धालु निशान लेकर शामिल हुए। फतेहगढ़ में मुगलकाल से जाहरवीर
गोगा के निशान निकालने की परंपरा है। यह आयोजन बाल्मीकि समाज का सबसे बड़ा
आयोजन है। इस रवायत में शामिल होने के लिए शनिवार की रात से ही फर्रुखाबाद,
फतेहगढ़ के अलावा कन्नौज, छिबरामऊ,
गुरसहायगंज, अलीगंज, कंधरापुर,
दारापुर, धीरपुर, कमालगंज, बिबियापुर, रजीपुर, अमेठी नरायनपुर के जाहरवीर
गोगा के सेवक व भगत निशान लेकर पहुंच गए थे। रविवार सुबह निशानों को
फतेहगढ़ कोतवाली के पास रखा गया। यहां निशानों की पूजा की गई। दोपहर बाद
यहां ढोल नगाड़ों की धुनों पर निशान यात्रा शुरू हुई। उत्तर प्रदेश सफाई
मजदूर
संघ के प्रदेश अध्यक्ष रामप्रसाद बाल्मीकि ने झंडी दिखाकर निशान
यात्रा की शुरुआत कराई। यात्रा के दौरान सड़कों को क्रास करते तार हटा दिए
गए। किसी अनहोनी से बचने के लिए बिजली काट दी गई। इस बार शोभायात्रा
में 59 निशान शामिल हुए। यह निशान डेढ़ से दो क्विंटल वजनी थे। इनकी लंबाई
करीब 35 फीट तक थी। इन्हें नारियल, फूलों,
मोरपंख, रंगीन पन्नी व चित्रों
से सजाया गया था। सेवक इन्हें कमर में बंधे पट्टे पर रखकर चल रहे थे। निशान
यात्रा के दौरान रोड पर महिला, पुरुष व बच्चों की बेशुमार भीड़ थी। बच्चे
छोटे कम वजन के निशान लिए हुए थे। जाहरवीर गोगा मंदिर के पास हवन किया गया।
यहां निशानों का पूजन किया गया। इसकेे बाद प्रसाद बांटा गया। पूजन के बाद
जाहरवीर गोगा मंदिर से भगत व सेवक निशानों को वापस ले गए हैं। इन्हें फिर
से स्थली पर रखा जाएगा। भगत भादौं की नवमी तक निशानों की पूजा करेंगे। रविवार
को फतेहगढ़ चौराहे से जाहरवीर गोगा जी महाराज मंदिर तक सड़क के किनारे
मेला लगा था। यहां घरेलू सामान , खिलौनों व बाकी चीजों की खरीददारी की गई।
समाजसेवियों ने शर्बत, पानी
और पूड़ी-सब्जी के स्टाल लगाकार शोभायात्रा में
शामिल लोगों को जलपान करवाया। निशान यात्रा में लोग ढोल नगाड़ों पर झूमते
रहे। सियाराम,श्याम कुमार, श्रीकृष्ण बाल्मीकि, राजू शुक्ला, विनय
बाल्मीकि, विष्णु प्रसाद, दिनेश बाल्मीकि, रतनकुमार, अमर पाल, राकेश चौधरी,
अजय, दीपक कुमार आदि ने व्यवस्था संचालन किया।
मेन रोड बंद, रूट डायवर्ट
निशान
यात्रा को लेकर फतेहगढ़ कोतवाली के सामने से तिराहा को बंद कर दिया गया
था। फतेहगढ़ चौराहे से अंबेडकर तिराहा तक आम लोगों के निकलने पर रोक लगा दी
गई। लोग फतेहगढ़ से जिला जेल चौराहा, सातनपुर रोड होते हुए फर्रुखाबाद
पहुंचे। फतेहगढ़ चौराहा से कैंट, मसेनी व अंबेडकर तिराहा से मूक बधिर स्कूल
के सामने से जेल रोड पहुंचे। बड़े वाहनों व टेंपों को भोलेपुर रोक दिया
गया था।
डगमगाए लेकिन संभाले रहे निशान
कड़ी धूप से
सेवकों, भगतों व श्रद्धालुओं को खासी दिक्कत हुई। निशान बनाने वाले व
इन्हें उठाने वाले परंपरा के अनुसार नंगे पैर थे। धूप में सड़क तप रही थी।
वजनी निशान उठाए सेवक कई बार डगमगाए लेकिन इन्होंने निशानों को संभाले रखा।
निशान के जमीन पर गिरने से सामाजिक कार्रवाई का रिवाज है। निशान के गिर
जाने पर सामूहिक भोज कराना पड़ता है।
श्रद्धा के साथ देश भक्ति भी
निशानों
को सेवकों ने खूब सजाया था। इनमें मोर पंख लगे थे। इसके साथ ही निशानों पर
भारत का नक्शा, सुभाष चंद्र बोस के फोटो भी लगाए गए थे। गदा,सर्प व
विभिन्न मंदिरों की आकृतियां भी उभारी गई थीं। निशानों को सूखे नारियल,
बेला व गुलाब के फूलों से भी सजाया गया था।