निवाड़ीकला। इस बार भूसे के दाम सातवें आसमान पर हैं। जिसके कारण अब दूध पर भी महंगाई की मार दिखाई देने लगी है। पशुपालकों का कहना है कि दूध का भाव भी महंगे भूसे के हिसाब से बढ़ाए जाने चाहिए, जिससे कि उनकी लागत निकल सके और पशुओं को भी भरपूर आहार उपलब्ध कराने में कोई दिक्कत न हो।
आमतौर पर गांवों में 500 से 600 रुपये प्रति क्विंटल बिकने वाला भूसा अब 1200 रुपये में बमुश्किल मिल रहा है। पशुपालक भूसा महंगा होने के कारण पशुओं को हरा चारा, सरसों की तूरी और धान का पुआल खिलाकर काम चला रहे हैं।
गांवों में गाय का दूध दो से पांच और भैंस का दूध पांच से सात रुपये प्रति किलो महंगा हो गया है। वहीं डेयरी पर दूध के दाम 55-60 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गए है। पशुपालकों का कहना है कि अभी दो माह और भूसे की किल्लत रहेगी।
अप्रैल के अंत और मई की शुरुआत में गेहूं की कटाई और थ्रेसिंग शुरू होते ही बाजार में नया भूसा आ जाएगा , इसी के बाद दाम कुछ कम होंगे।
पशुपालकों ने बताई परेशानी
पशुपालक अरुण कुमार का कहना है प्रत्येक वर्ष भूसा के दाम 800-900 प्रति क्विंटल पर थम जाते थे। इस बार 1200-1400 रुपये प्रति क्विंटल दाम हैं।
अब इतना महंगा चारा खिलाकर आखिर पशु पालने में क्या लाभ होगा। वहीं पशुपालक पप्पू का कहना है कि दूध का भाव बढ़ाने की मजबूरी है। भूसा, खली, दाना और चोकर सब कुछ तो महंगा है तो दूध सस्ता कैसे बेचा जा सकता है।
क्षेत्रीय पशुपालक बताते हैं कि करीब तीन से चार वर्ष पूर्व गांवों में साइकिल सवार दूधिए दूध की टंकी बांधकर घर-घर जाकर बेचते थे। तमाम बड़ी दूध डेयरी के गांवों में छोटे-छोटे दूध संग्रहण केंद्र खोले जाने से काम खत्म हो गया है। अब इन केंद्रों पर दूध की दर तय होती है और पशुपालक को पर्ची भी मिल जाती है।
गोशालाओं में पूरा नहीं हो रहा भूसा
ब्लॉक की अधिकतर गोशालाओं में भूसे की महंगाई का असर साफ दिखाई दे रहा है। गोशालाओं में उन्हें पुआल और सरसों का भूसा खिलाया जा रहा है। आखिर 30 रुपये में एक गोवंश को कैसे भरपेट चारा खिलाया जा सकता है।
वहीं संचालकों का कहना है कि भूसा इतना महंगा है जिससे समस्याएं आ रही हैं। हालांकि गोवंश को सरसों और गेहूं का भूसा खिलाया जा रहा है।