चकरनगर। भारत की आजादी का हीरक जयंती वर्ष शुरू हो गया है, लेकिन चंबल के गौरवशाली इतिहास का उत्खनन बहुतेरे कारणों से नहीं किया गया। यही कारण है कि शहीदों को उनके विचारों आदर्शों के आधार पर स्मरण न कर औपचारिक रूप से रस्म अदायगी कर ली जाती है।
सन 1192 में तराइन के युद्ध में दिल्ली सम्राट पृथ्वीराज चौहान जब गजनी के सुल्तान से पराजित हुए थे। तब पृथ्वीराज के एक सेनापति सामंतराव ने अपनी बची सैन्य शक्ति को संगठित कर इटावा व आसपास के इलाकों में अपना राज्य स्थापित किया था। सन 1857 में इसी चकरनगर रियासत के राजा कुशल पाल सिंह चौहान थे।
आजादी की जंग का शंखनाद होते ही, राजा कुशल पाल सिंह और उनके पुत्र वीर योद्धा निरंजन सिंह जूदेव ने दोआब क्षेत्र को आजादी की लड़ाई की अग्रिम चौकी में बदल दिया था। उनके साथ अंग्रेजी फौज के बागी सिपाही अपनी बंदूकों समेत दोआब इलाके में आजादी की जंग का परवान चढ़ाने आ डटे थे।
राजा कुशलपाल सिंह जनता में बहुत ज्यादा लोकप्रिय थे। उनके पुत्र निरंजन सिंह युद्धकला में बहुत दक्ष थे। उनका अपना कन्हैया घोड़ा, सह योद्धा मंगली मेहतर और जंगली मेहतर प्राणों से अधिक प्रिय थे। आजादी की जंग में दोआब क्षेत्र के बागी सिपाहियों, किसानों तथा जनता के सभी समुदायों के नेतृत्व को स्वीकार किया। निरंजन सिंह की वीरता और सैन्य शक्ति की कीर्ति चारो ओर दोआब के उस पार भिंड जिले के कुशवाह धार तक फैल गई थी।
ब्रिटिश शासकों ने एक बड़ी फौज को लेकर जुहीखा घाट पर बर्बर हमला कर दिया और दोआब इलाके में दाखिल होने की कोशिश की। ब्रिटिश सेना का नेतृत्व इटावा का कलेक्टर एओ ह्यूम कर रहे थे। इस युद्ध में दोआब के रणबांकुरों के साथ-साथ बहुत बड़ी संख्या में कुशवाह धार के योद्धाओं ने वीर योद्धा चिमना के नेतृत्व में हिस्सा लिया। दोनों पक्षों के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हुए। अंग्रेज दोआब इलाके में दाखिल नहीं हो सके।
दो सालों तक नहीं दाखिल हो सकें अंग्रेज सैनिक
मई 1857 में शुरू हुआ स्वतंत्रता संग्राम दो वर्षों से अधिक समय तक दोआब क्षेत्र में विद्रोही योद्धा निरंजन सिंह ने जारी रखा। उन्होंने अंग्रेजी फौजों को इलाके में दाखिल नहीं होने दिया। उन्होंने डभोली, दिलीप नगर, जुहीखा, सिकरोड़ी, नदी घाटों को अंग्रेजों से लड़ाई लड़ीं, बर्बर लुटेरी अंग्रेजी फौजों को करारी शिकस्त देकर विद्रोही चंबल के मानव की श्रेष्ठ गुणवत्ता से दुनिया को परिचित कराया।
1861 में बनाया गया था बंदी
29 मई 1861 में राजा निरंजन सिंह को जयपुर के विश्वासघाती नरेश के इशारे पर वहां के राजनीतिक एजेंट ने बंदी बना लिया था। चंबल में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की जो ज्वाला भड़की थी, उसके अपने निजी कारण थे। लेकिन इसमें विद्रोहियों की प्रेरणा उसकी अपनी ग्वालियर रियासत न होकर, चंबल से लगे उप्र के आगरा, इटावा, जालौन, झांसी जिले तथा उसके अपने क्रांतिकारी योद्धा थे। जिन्होंने चंबल में स्वतंत्रता की चिंगारी को जन-जन में भड़काया था और चंबल के बागपन को अखिल भारतीय स्तर पर क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बनाया।
चंबल में 1872 तक जारी रहा था संघर्ष
1857 में भड़की ज्वाला को अंग्रेजी शासन ने जहां देश के अलग-अलग हिस्सों में 1858 तक अपने कब्जे में कर लिया था, लेकिन चंबल में यह संघर्ष लगातार 1872 तक जारी रहा। आजादी के मतवालों के लिए यहां की भोगौलिक स्थितियां उनके गुरिल्ला युद्ध के लिए बहुत मुफीद थी। बंदूकों में बारूद भरने का समय यहां मिट्टी के पहाड़ ओट दे देते थे।
उपेक्षा से नाराज
चकरनगर स्टेट के राजा निरंजन सिंह के पुत्र राजा विजय प्रताप सिंह जूदेव इंडियन आर्मी 24 राजपूत बटालियन में कैप्टन पद से रिटायरमेंट के बाद वर्तमान में जयपुर में रहते हैं। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर है कि आजादी के इस दौर में हमारे पूर्वजों को सरकार की तरफ से दो फूल तक अर्पित नहीं किए गए। आजादी के दौरान सब कुछ कुर्बानी देने वाला परिवार के वंशज आज शासन प्रशासन से उपेक्षित है।
फोटो संख्या 10- राज निरंजन सिंह जूदेव का फोटो- फोटो : ETAWAH
फोटो संख्या 11- राजा विजय सिंह- फोटो : ETAWAH