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जैविक खेती से सोना उगल रहे हैं खेत

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अजीत सिंह। - फोटो : ETAH
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एटा। तमाम किसान कम पैदावार और फसलों के मूल्यों को लेकर परेशान हैं। लेकिन मलावन क्षेत्र में खेत सोना उगल रहे हैं। यहां रहने वाले किसान अजीत सिंह ने जैविक खेती को अपनाकर बड़ा परिवर्तन कर दिखाया है। गोबर की खाद और कीटनाशक के रूप में गोमूत्र के छिड़काव से हुई उनकी खेती मशहूर हो चुकी है। दिल्ली और लखनऊ तक के लोग उनके खेत में पैदा गेहूं को 4000 से 6000 रुपये कुंटल तक के भाव में खरीद रहे हैं।
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मलावन के रहने वाले अजीत सिंह के पास 30 बीघा जमीन है। इस पर वह 2018 तक यूरिया और रसायनों के जरिए खेती करते रहे। इसके बाद अपनी गोशाला बनाई। वह बताते हैं कि जयपुर और मथुरा में गोशालाओं पर जाकर खेती में गोबर खाद और गोमूत्र के प्रयोग की जानकारी ली। इसके बाद 2019 से अपने खेतों में जैविक खेती की शुरूआत कर दी। रसायनों के मुकाबले उत्पादन कम है, प्रति बीघा 2.5 से 3 कुंटल गेहूं का उत्पादन मिलता है।
लेकिन इस गेहूं की मांग बहुत ज्यादा है। खासतौर से लखनऊ और दिल्ली के कई अधिकारी और बड़े व्यापारी व्यक्तिगत प्रयोग के लिए यह गेहूं मंगाते हैं। पिछले साल 6000 रुपये कुंटल तक में बेचा था। इस साल 5 हजार रुपये कुंटल की बिक्री हुई है।
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बच रहा खाद-कीटनाशक पर हजारों का खर्च
अजीत सिंह बताते हैं कि एक बीघा खेती पर 2000 रुपये तक की डाई और यूरिया के अलावा 500 रुपये तक के कीटनाशक का खर्च आता था। अब इसकी पूरी बचत हो रही है। 30 बीघा खेती पर 60-70 हजार रुपये बच रहे हैं।
मुनाफा देख गोबर खाद ले जाने लगे लोग
अजीत सिंह की खेती में मोटा मुनाफा देख आसपास के तमाम किसानों का रासायनिक खेती से मोहभंग हुआ है। उन्होंने गोशाला से गोबर खाद लेना शुरू कर दी है। एक ट्रॉली गोबर खाद 800 रुपये की प्राप्त हो रही है।
रसायनों के दुष्प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है। जिसे देखते हुए जैविक खेती पर जोर दिया जा रहा है। यह खेत की मिट्टी में जीवांश और फसल के अलावा मानव स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर है।
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- एमपी सिंह, जिला कृषि अधिकारी
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