एटा। सीमा पर रणबांकुरों के दमखम से ही देश सुरक्षित है। 1999 में कारगिल की चोटियों पर पाकिस्तान की सेना का कब्जा था। हमारे वीर जवानों ने उनको चोटी से उखाड़ फेंका और फतह पाई। इसी युद्घ में जिले के भी दो जवानों ने शहादत दी थी। शहीद पुष्पेंद्र यादव के भाई शिवकुमार यादव उस समय की याद कर आज भी रोमांचित हो जाते हैं।
कारगिल युद्ध में जिले के जवानों की शहादत से परिजनों को सेना पर गर्व है। सदर तहसील क्षेत्र के गांव घिलौआ निवासी पुष्पेंद्र यादव 13 कुमायूं रेजीमेंट में वर्ष 1998 में जवान नियुक्त हुए थे। अगले ही साल 1999 में कारगिल युद्ध शुरू हो गया। पुष्पेंद्र ने अपनी पहली तैनाती में ही दुश्मनों से जमकर मोर्चा लिया। शहीद के छोटे भाई शिवकुमार ने बताया कि वह पढ़ाई में ठीक थे। खेती में पिताजी का साथ समय देते थे। पढ़ाई के बाद जो समय मिलता, उसमें दौड़ लगाते थे, कब्बड्ी में रुचि रखते थे। पुष्पेंद्र दूध पीने के शौकीन थे। घर आते ही मां से दूध की मांग कर देते। उन्हें दूध भी मलाई के साथ चाहिए था। हम लोग कपड़े धोते थे और वह धुले हुए कपड़े पहन कर निकल जाते थे। पिताजी के पास पांच बीघा खेत थे जैसे-तैसे परिवार के भरण पोषण के साथ हम सभी को पढ़ाया। हम तीन भाई और दो बहनें हैं। एक भाई शिकोहाबाद में एसबीआई बैंक में कर्मचारी हैं। बहनें दोनों बड़ी हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। पुष्पेंद्र की शादी नहीं हुई थी।
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चाचा को देखकर सेना में जाने का बनाया लक्ष्य
शिवकुमार बताते हैं उनके चाचा श्रीपाल सिंह सेना में थे। उन्हें देखकर ही पुष्पेंद्र ने सेना में जाने का लक्ष्य तय किया था। जब चाचा छुट्टियों में घर आते, तो पुष्पेंद्र उनसे आर्मी की तैयारी के बारे में जानकारी लेते थे।
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शहीद सुनील का परिवार आगरा में जा बसा
अलीगंज तहसील के गांव कठिंगरा निवासी शहीद कैप्टन सुनील का परिवार उनकी शहादत के बाद आगरा में जा बसा। सुनील का विवाह नहीं हुआ था। उनके नाम एक पेट्रोल पंप सरकार से मिला। आगरा में दो भाई उसको संचालित करते हैं।