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दशकों से कब्जे में रही सात बीघा सरकारी जमीन का कराया घेराबंदी

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चकिया। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट तथा नगर प्रशासक प्रेमप्रकाश मीणा ने शुक्रवार को बड़ी कार्रवाई करते हुए नगर स्थित सलया के ताल की सात बीघा भूमि को कब्जेदारों के चंगुल से मुक्त कराने के साथ ही नगर पंचायत चकिया के कब्जे में कर लिया। इस कार्रवाई के दौरान ताल की जमीन पर बसे 28 कब्जेदार अपना भवन सहित भूमि छोड़कर दूसरी जगह चले गए। दो नोटिस के बाद कब्जेदारों के न हटने पर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने स्वयं मोर्चा संभाला। जमीन को पिलर के जरिए तारकसी कराकर नगर पंचायत के कब्जे में ले लिया। इस कार्रवाई के दौरान भूमि खरीदकर बसने वाले लोगों का विरोध कोई काम नहीं आया।
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नगर पंचायत चकिया में सलया के ताल के नाम से दशकों पूर्व जमीन सरकारी दस्तावेजों में दर्ज थी। कालांतर में इस ताल की जमीन को राजस्व अधिकारियों ने अभिलेखों में हेराफेरी कर भूमिधरी के रूप में पार्वती लाची तथा कलावती के नाम से दर्ज कर दी गयी थी। जिन्होंने इस ताल की जमीन को 28 लोगों को ऊंचे दामों में बेच दिया था। जिसे लंबी सुनवाई के बाद चकिया के तत्कालीन एसडीएम रामसजीवन मौर्य ने वर्ष 2018 में पुन: ताल घोषित कर दिया। सभी खरीद बिक्री प्रपत्र को निरस्त कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने ताल की जमीन को सरकारी जमीन मानते हुए इस तरह की भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने का आदेश पारित किया है। इस आदेश को देखते हुए ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रेमप्रकाश मीणा ने ताल की भूमि पर काबिज 28 लोगों को 12 अगस्त को नोटिस जारी कर भूमि को खाली करने का फरमान जारी किया। 15 अगस्त को अतिक्रमणकारियों के मकान पर नोटिस चस्पा कर मकान व परती जमीन को खाली करने को कहा गया था। इसके बावजूद कोई प्रगति न होने पर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने 18 अगस्त को अंतिम नोटिस जारी की। बावजूद इसके अतिक्रमण हटाने का कोई संकेत न मिलने पर शुक्रवार को जमीन की घेराबंदी का कार्य आरंभ करा दी। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रेमप्रकाश मीणा और राम्या के नेतृत्व में तहसीलदार विकासधर दूबे, नगर पंचायत के कर्मचारी, लेखपाल, कानूनगो, संग्रह अमीनो एवं चकिया थाने की पुलिस फोर्स मौके पर पहुंची। इस कार्रवाई के दौरान जमीन पर मकान बनाकर दुकानें चला रहे आधा दर्जन लोगों ने अपने दुकान का सारा सामान, दरवाजा, खिड़की, शटर, गृहस्थी का सारा सामान निकालकर चलते बने। इसके पूर्व भाजपा कार्यकर्ताओं एवं जमीन पर काबिज लोगों ने विरोध भी किया लेकिन उनका विरोध निरर्थक साबित हुआ। इस दौरान पूरी जमीन पर पिलर गाड़कर तार के जरिये घेराबंदी कर दिया गया। जमीन के नगर पंचायत के होने का बोर्ड भी लगा दिया गया।
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