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फाग गीतों के स्थान पर अब बजते हैं फूहड़ गीत

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पीडीडीयू नगर। होली को प्रेम, एकता, भाईचारा और मस्ती का वाहक माना जाता रहा है लेकिन दौड़ती-भागती जिंदगी में त्योहार का वह रूप अब नहीं दिखाई पड़ता। बुजुर्गों का कहना है कि पहले होली के कुछ दिन पहले से फाग गीतों की आवाज वातावरण में गूंजने लगती थीं। इन गीतों में ऋतु परिवर्तन के संदेश के साथ मस्ती और अल्हड़ता होती थी पर अब इन गीतों का स्वरूप बदल गया है। फाग गीतों का स्थान फूहड़ता से भरे गीतों ने ले लिया है। मस्ती के नाम पर गंदे गाने बजने लगे हैं।
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जिले में होली दो दिन मनाई जाती है। पहले दिन होलिका दहन के साथ पर्व की शुरूआत होती है। इसके अगले दिन सुबह लोग रंग खेलते हैं। एक दूसरे को रंगों से सराबोर करने के बाद दोपहर में स्नान करते हैं। फिर शाम को नए वस्त्र पहनकर एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाते हैं और गले मिलकर पर्व की बधाई देते हैं। पर्व के इस शानदार स्वरूप को फूहड़ गीतों ने बिगाड़ दिया है। विशेषकर भोजपुरी गीतों और एलबमों में अश्लील गीत सुनाई देते हैं। सवारियां ढोने वाले वाहनों में ये गीत तेज आवाज में बजाए जाते हैं। इससे परिवार के साथ इन वाहनों में सफर करना मुश्किल होता है। इसके अलावा बाजारों में भी कई दुकानों पर होली के फूहड़ भोजपुरी गीतों के बजते रहने से महिलाओं को परेशानी होती है।
कूढ़ेखुर्द निवासी बैजनाथ यादव ने कहा कि आज की पीढ़ी के नौजवानों को होली के रंग तो याद हैं लेकिन प्रेम, एकता और भाईचारा का संदेश देने वाली भावनाएं नदारत हो गई हैं। फाग गीतों का स्थान फूहड़ गीतों ने ले लिया है।
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मुस्तफापुर निवासी वंशनारायण यादव ने बताया कि पहले होली की मस्ती का अलग ही मजा था पर अब आधुनिकता के दौर में युवा पीढ़ी अपनी परंपराओं के प्रति काफी उदासीन दिख रही है। युवाओं में परंपरागत संस्कृति के विलुप्त होता देख पुरानी पीढ़ी काफी चिंतित है।
बेटाडीह निवासी वीरेंद्र सिंह का कहना है कि पहले पलाश के फूलों के रंग से होली खेलने की परंपरा थी लेकिन अब केमिकलयुक्त रंगों ने इसपर कब्जा कर लिया है। होली की प्राचीन परंपराएं अब अतीत की याद बनती जा रही हैं।
खोर गांव के महंगू कन्नौजिया ने कहा कि उद्दंडता, अश्लीलता व मांस-मदिरा का प्रचलन होली पर हावी होता जा रहा है। युवा वर्ग अपनी पुरानी परंपराओं के प्रति उदासीन होता जा रहा है। अब त्योहार का वह आनंद नहीं दिखता।
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