बदायूं। हर वर्ष 16 अक्तूबर को विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है, सरकार देश से कुपोषण दूर करने के लिए तमाम तामझाम भी करती है, लेकिन कुपोषण बदायूं जिले का पीछा ही नहीं छोड़ रहा। यहां बच्चों से लेकर माताएं तक कुपोषण की जद् में हैं। आंगनबाड़ी केंद्र कमाई का जरिया बने हैं। छह माह से पांच वर्ष तक के बच्चों की बात करें या फिर गर्भवती माताओं की, बदायूं में हालात नहीं सुधर रहे।
आंगनबाड़ी केंद्रों पर मुफ्त में बांटा जाने वाला पोषाहार बाजारों में ब्लैक कर कमाई की जाती है। इन सबके बीच कुपोषण जहां का तहां बना रहता है। जिले में अब भी 18000 से ज्यादा पांच वर्ष तक के बच्चे कुपोषित हैं। 4200 बच्चे कुपोषण की रेड लाइन पर हैं। बाल विकास परियोजना पर करोड़ों रुपया खर्च हो रहा है। बाल विकास परियोजना के जिला स्तरीय आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में छह माह से पांच साल तक के कुल 287000 बच्चे हैं। इनमें 13879 बच्चे कुपोषित और 4200 से ज्यादा बच्चे अति कुपोषित हैं। कोरोना काल में नई व्यवस्था के तहत बच्चों को दाल, चना, देसी घी समेत अन्य पोषाहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई थी, लेकिन यह सूखा राशन भी भ्रष्टाचार की भेट चढ़ गया। आंगनबाड़ी, सहायिका मिलाकर बच्चों को बांटे जाने वाले सूखे पोषाहार को ब्लैक कर देती हैं। ब्लॉक से जिला स्तर तक अफसरों को सब कुछ पता है। इसके बाद भी कार्रवाई नहीं होती।
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जिले में कुपोषण की स्थिति खत्म करने और माताओं व बच्चों को तंदुरुस्त बनाने के लिए बाल विकास विभाग कई योजनाओं का क्रियान्वयन कर रहा है। बच्चों को ड्राई राशन भी मुहैया कराया जा रहा है। आंगनबाड़ी के जरिये गांव में अति कुपोषित बच्चों की पहचान करके उन्हें जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र लाया जाता है।
- आदीश मिश्रा, जिला कार्यक्रम अधिकारी, बाल विकास विभाग