रामधारी सिंह दिनकर के जन्म दिवस पर विशेष : दिनकर का दुष्यंत कुमार से रहा गहरा नाता
बिजनौर। अपनी कविताओं से सत्ता सदनों के प्रति हुंकार का भाव रखने वाले रामधारी सिंह दिनकर का बिजनौर के राजपुर नवादा में जन्मे हिंदी ग़जल के प्रणेता कहे जाने वाले दुष्यंत कुमार पर बेहद स्नेह था। दिनकर के जन्मदिवस पर उन्हें जनपद के साहित्यकार स्मरण कर रहे हैं।
अपनी कविता के माध्यम से सत्ता के विरुद्ध मुखर आवाज रहे रामधारी सिंह दिनकर का जन्म बिहार के बेगूसराय जनपद के सिमरिया गांव में हुआ था। वह सांसद भी रहे। उन्होंने ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती हैऽ जैसी कालजयी कविता लिखकर जनता की आवाज बुलंद की, तो दुष्यंत कुमार ने ऽमेरे सीने में न सही तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए% लिखकर क्रांति को नए सिरे से परिभाषित किया। दिनकर की रचनाओं ने जयप्रकाश के ‘दूसरी आजादी ‘ के आंदोलन में प्राण फूंके तो दुष्यंत जी की ग़जलों ने अन्ना आंदोलन को नए तेवर दिए। दोनों ही कवि सहज भाषाओं में बड़ी बात कह जाते थे। एक बार रामधारी सिंह दिनकर दुष्यंत कुमार के घर आए तो भोपाल के प्रसिद्ध छायाकार नवल जायसवाल ने उनका एक फोटो भी खींचा था, जो आज भी भोपाल स्थित दुष्यंत संग्रहालय में संरक्षित है।
दुष्यंत कुमार को दिनकर के करीब लाने में उनकी कविताओं की भूमिका थी जो अपराजेय आस्था, निर्भीक आशावादिता और भारतीय संस्कारों से ओतप्रोत थी और इसीलिए दिनकर को बहुत पसंद थी। दुष्यंत कुमार के बेटे आलोक त्यागी बताते हैं कि जिस समय दुष्यंत कुमार का पहला कविता संग्रह ऽसूर्य का स्वागतऽ प्रकाशित हुआ, उस समय प्रयोगवादी कवियों का बोलबाला था। सूर्य का स्वागत’ के संबंध में रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था कि यदि आपको प्रयोगवादी कविताओं की सड़ांध से बचना है तो आपको यह गुलाब सूंघना चाहिए जिसका नाम है ‘सूर्य का स्वागत’।
जब दिनकर ने कर दिया था दिल्ली का कार्यक्रम रद्द
आलोक त्यागी बताते हैं कि एक बार दुष्यंत कुमार ने रामधारी सिंह दिनकर से बिना पूछे मेरठ के एक कार्यक्रम में उन्हें लाने का वायदा कर लिया। दुष्यंत कुमार ने दिनकर से सहजता के साथ जाकर कहा कि आप को एक कार्यक्रम में मेरठ चलना है। तब दिनकर ने कहा कि उनका दिल्ली में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम है। नाराज होते हुए बोले कि उनके पास केवल एक ही काया है जो दो स्थानों पर नहीं जा सकती। इस पर दुष्यंत कुमार ने कहा कि तब तो आपकी यह काया मेरठ ही जाएगी। ये रामधारी सिंह दिनकर का बड़प्पन था कि वे अधिकारपूर्वक किए आत्मीय हट के सामने झुके। उन्होंने दिल्ली का कार्यक्रम रद्द कर दिया था और वह दुष्यंत कुमार के साथ मेरठ चले गए थे।