गाजीपुर बॉर्डर बन गया था जिले के किसान नेताओं का नया पता
बिजनौर। कृषि सुधार के लिए लागू किए गए कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन की शुरुआत बिजनौर से ही हुई थी। तब गाजीपुर बॉर्डर जिले के किसान नेताओं का दूसरा पता बन गया था। जिले के किसान संगठनों के नेताओं ने गांव-गांव जाकर लोगों को कानूनों के बारे में बताया और आंदोलन से जोड़ा। आंदोलन में लगाए गए जाम की वजह से किसान नेताओं ने मुकदमे झेले और जनता ने परेशानी। जिले के हजारों किसान गाजीपुर बॉर्डर पर चले आंदोलन में शामिल हुए। सर्दियों की बारिश और गर्मियों में लू में भी किसान आंदोलन में डटे रहे। हालांकि मार्च के बाद से किसानों का आंदोलन में शामिल होना बहुत कम हो गया था।
कृषि कानूनों के खिलाफ सबसे पहले रणनीति गांव स्वाहेड़ी में बनी थी। यहां दो अगस्त 2020 को राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार वीएम सिंह, भाजपा के पूर्व सांसद राजू शेट्टी और नेता योगेंद्र यादव आए। वे जिलाध्यक्ष विनोद कुमार के घर रात को 12 बजे पहुंचे और खाना खाने से पहले आंदोलन की रणनीति बनाई। इसके बाद आंदोलन की शुरूआत की गई। विनोद कुमार के नेतृत्व में गांवों में सभाएं होने लगीं। 10 सितंबर को आंदोलन के विरोध में सबसे पहली बाइक रैली राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने ही निकाली और पांच नवंबर को सबसे पहला जाम लगाया गया। जाम लगाने पर 75 नामजद सहित 400 अज्ञात किसानों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई। धीरे-धीरे सभी संगठन भाकियू, भाकियू अंबावता, भाकियू लोकशक्ति, भाकियू भानु, आजाद किसान यूनियन किसान आंदोलन पर सामने आ गए। 24 नवंबर को भी जाम लगाया गया। जिले के किसानों का जत्था पहली बार राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के बैनर तले 26 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली महापंचायत में पहुंचने में सफल रहा था। बाकी संगठनों के किसानों को गाजीपुर बॉर्डर पर रोक दिया गया। इसके बाद जिले से किसानों का आंदोलन में शामिल होना जारी रहा। जिले के किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए लगातार ट्रैक्टर ट्रालियों से जाते रहे।
14 दिसंबर को सभी किसान संगठनों ने बैरिकेडिंग तोड़कर कलक्ट्रेट में प्रदर्शन किया था। 26 जनवरी को संसद घेराव के कार्यक्रम में भी शामिल होने कई किसान नेता गए थे, लेकिन उन्होंने दिल्ली हिंसा में शामिल होने से इंकार किया था। हिंसा के बाद भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत का अपने गांव का पानी पीने वाले बयान के बाद अगले दिन फिर से काफी संख्या में किसानों ने दिल्ली कूच कर दिया था। इसके बाद भी तमाम किसान नेता आंदोलन में शामिल होते रहे। 18 अक्तूबर को संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर जिले के किसान संगठनों ने ट्रेनें रोकी थीं। लखीमपुर खीरी में शहीद हुए किसानों की अस्थियों प्रवाहित करने के लिए 24 अक्तूबर को भाकियू युवा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गौरव टिकैत बिजनौर आए थे और गंगा घाट पर अस्थियां प्रवाहित कराई थीं।
रालोद, कांग्रेस और सपा ने भी कृषि कानूनों के खिलाफ जमकर आंदोलन किया। 15 अगस्त को सपा नेताओं ने कानूनों के विरोध में पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़कर रैली निकाली थी। पुलिस किसान नेताओं द्वारा जाम लगाने या दिल्ली कूच करने के एक दिन पहले ही उन्हें घर में जाकर नजरबंद कर देती थी।
आंदोलन में दिखे कई रंग
जिले में आंदोलन ने कई रंग भी दिखाए। 26 जनवरी को हुई हिंसा के बाद जिले के तमाम किसान संगठन राकेश टिकैत के साथ आ गए। सरदार वीएम सिंह और भाकियू भानु के राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर भानू प्रताप सिंह ने आंदोलन से समर्थन वापस लिया तो उनकी जिला कार्यकारिणी सदस्यों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था और वे भाकियू के साथ जुड़े, लेकिन थोड़े समय बाद ही वे फिर से अपने अपने संगठनों में वापस लौट गए।
और देखती रह गई पुलिस
पुलिस किसानों को दिल्ली जाने से रोकने के लिए कई हथकंडे अपनाती थी। बैराज पर कई बार किसानों के छोटे मोटे जत्थे को रोक दिया जाता था। भाकियू लोकशक्ति जिलाध्यक्ष वीर सिंह भी सर्दियों में गाजीपुर बॉर्डर जा रहे थे। उन्हें पता चला कि पुलिस उन्हें रोकने की कोशिश करेगी और एक दिन पहले ही गंगा बैराज पर पुलिस बल तैनात है। वीर सिंह घोषित तिथि से एक दिन पहले ही मंडावर में बने पीपे के पुल से चले गए।