देववाणी का गौरव हासिल करने वाले संस्कृत भाषा की शिक्षा देने के लिए संचालित राजकीय माध्यमिक संस्कृत विद्यालयों की हालत ठीक नहीं है। संस्कृत की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से बदहाल चल रही है। स्कूलों में न तो शिक्षक हैं और न ही छात्रों के लिए सहूलियत। कई स्कूलों में तो एक भी शिक्षक नहीं हैं। वहां के प्रबंधन द्वारा जुगाड़ के सहारे स्कूलों का संचालन किया जा रहा है।
संस्कृत भाषा को भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पहचान भी माना जाता है। इसके बाद भी संचालन के नाम पर महज खानापूर्ति हो रही है। माध्यमिक स्तर पर संचालित संस्कृत पाठशालाओं में कहीं बच्चे नदारद हैं तो कहीं गुरुजी। जिले में संचालित 19 विद्यालयों में से एक राजकीय, 12 वित्तपोषित और छह वित्तविहीन विद्यालय हैं। जिसमें पद सृजन के आधार पर 60 से कुछ ज्यादा शिक्षकों की जरूरत है। सालों से नियुक्ति नहीं होने से मात्र 13 शिक्षक ही पढ़ा रहे हैं। मार्च 2022 तक यह संख्या घटकर 11 पहुंच जाएगी। आलम यह है कि रोटहां, कड़ोर, महराजगंज के बारीपुर सहित छह संस्कृत स्कूलों में शिक्षक ही नहीं हैं। प्रबंधन की ओर से निजी शिक्षकों के सहारे स्कूलों का संचालन किया जा रहा है। कई स्कूलों में साल के 10 से 11 महीने ताला लटक रहता है। ऐसे में कैसे तैयार होंगे संस्कृत के विद्वान इसे लेकर भी सवाल खड़ा हो चुका हैं। स्थिति यह है कि संस्कृत विद्यालयों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। विद्यालयों का भवन भी ठीक नहीं है। ज्ञानपुर का संस्कृत स्कूल देखकर यहां की स्थिति के बारे में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। शासन स्तर से राजकीय माध्यमिक संस्कृत विद्यालयों में संविदा पर शिक्षकों की तैनाती के लिए अनुमति दी गई। इसके लिए चार विद्यालयों की ओर से तैनाती के लिए अक्तूबर 2021 में प्रक्रिया शुरू की गई तो 211 आवेदन पत्र प्राप्त हुए। कुछ स्कूलों में संविदा शिक्षक रखे गए, लेकिन तकनीकी कमियों के चलते कुछ शिक्षकों की नियुक्ति लटकी हुई है। डीआईओएस नंदलाल गुप्ता का कहना है कि संस्कृत स्कूलों में कई साल से नियुक्ति नहीं हो रही है। साथ ही पुराने शिक्षकों के सेवानिवृत्त होने से शिक्षकों की कमी है। संविदा पर कुछ स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति की गई है। शिक्षकों की कमी को लेकर शासन को पत्र लिखा गया है।